कर्नाटक चुनाव: कैसे पीएम मोदी के इन पांच कदमों ने पलट दी बाजी

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लोग चाहे किसी भी पार्टी के पक्ष के थे लेकिन वे सभी एक बात पर जरूर सहमत थे और वो बात थी आखिरी चुनाव प्रचार में नरेन्द्र मोदी का अपने कैंपेन के जरिए चुनावी बाजी को पलटने की क्षमता।
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने कहा कि उनके पास एक तुरूप का पत्ता था, एक चुनावी मुद्दा था और वो थे- मोदी। कांग्रेस के नेता जानते थे कि मोदी की बाकियों से रैलियां अलग थी। लेकिन उन्हें इस बात पर शक था कि क्या बीजेपी को स्थानीय चुनौतियो से मुकाबला करने में ये रैलियां उनकी मदद कर पाएगी।मोदी के चुनाव कैंपेन में ताकत झोंकने से पहले कांग्रेस के नेता 110 सीटें मिलने को लेकर आश्वस्त थे। कर्नाटक के नतीजों से यह साफ जाहिर है कि बीजेपी के तुरूप के पत्ते ने काम किया, जिसके चलते उसे बड़ी पार्टी बनने में मदद मिली है। कांग्रेस की चिंता स्वाभाविक थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे फिर से अपने नाम चुनाव कर बीजेपी को जीत दिलाई।
आइये जानते हैं मोदी ने ये सब कैसे किया?
1-रैलियों में इजाफा:
पीएम मोदी की पहले कर्नाटक में 15 रैलियां निर्धारित की गई थी। लेकिन, जब कैंपेन आखिरी दौर में पहुंचा तो उसके बाद उन्होंने उसे बढ़ाकर 21 धुआंधार रैलियां की। कई लोगों ने इसे कमजोरी का संकेत माना। लेकिन, अन्य लोगों का यह तर्क था कि प्रधानमंत्री की रैलियां लोगों को अपनी ओर खींच रही है और पार्टी दूसरों के मुकाबले आगे चल रही है। ऐसे में उन्हें एक और अंतिम जोर की जरूरत है।पहले का चुनावी अनुभव यह दर्शाता है कि चुनाव प्रचार में मोदी ने कामयाबी दिलाई है चाहे वो बात गुजरात में 30 से ज्यादा रैलियों की हो या फिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में आखिरी तीन दिन का चुनाव प्रचार हो।मोदी की रैलियों की संख्या में इजाफे ने जीत में मदद की और चुनाव का टर्निंग प्वाइंट रहा। लेकिन, इन रैलियों की सबसे खास बात ये रही कि उन्होंने अपने सभी भाषणों में क्षेत्र पर फोकस रखा और स्थानीय जरुरतों को पूरा करने के लिए पार्टी की प्रतिबद्धता दोहराई।
2-भ्रष्टाचार को मोड़ा
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर का रूख रक्षात्मक रहा था। बीजेपी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे जबकि रेड्डी ब्रदर्स और उनके सहयोगियों को टिकट दिया गया था।सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस को यह मौका मिला कि बीजेपी के खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर आक्रामक हो। मोदी ने इसमें दो तरह से बदलाव किया। पहला, मोदी की साफ छवि ने स्थानीय स्तर पर किसी नुकसान को कम किया। मोदी लागातर इस बात को कहते रहे कि उनकी लड़ाई काला धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ है और जिसने गरीबों का पैसा लूटा है उन्हें वापस करना होगा। इस दिशा में नोटबंद को औजार बनाया गया। यही वजह थी कि कांग्रेस ने उसका विरोध किया।
3- कल्याणाकारी योजानाएं
सिद्धारमैया की इस चुनाव में सबसे अहम चीजें थी कल्याणकारी योजनाएं जो उन्होंने शुरू की थी। कांग्रेस ऐसा आकलन लगाकर बैठी थी कि इसके चलते गरीब लोग पार्टी के साथ आएंगे। लेकिन, मोदी ने जोरदार तरीके से अपने कल्याणकारीय योजनाओं और गरीबों के लिए शुरूआत किए गए उनके कार्यक्रमों को लोगों के सामने रखा। आज सभी बीजेपी नेताओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं सर्वोपरि हो गई है। लेकिन, जब मोदी जब इस विषय पर बोलते हैं तो वह निर्वाचकों के साथ अलग तरीके से जुड़ते हैं। वे गैस कनेक्शन की बात करते हैं, वे ग्रामीण भारत में बिजली की बात करते हैं, वे शौचालय निर्माण की बात करतें हैं, वे बैंक एकाउंट्स खुलवाने की बात करते हैं और इस बात का दावा करते हैं कि उनकी इन योजनाएं से गरीबों का भला होगा।
4-दलित मुद्दा
इस चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी दुविधा की बात थी दलितों का गुस्सा और अशांति। दलित अत्याचार रोकथाम कानून पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह चुनाव हुआ, जिसके चलते भारत बुंद बुलाया गया था। कर्नाटक में 16 फीसदी दलितों की आबादी है। दलितों के कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होने से उसकी जीत हो सकती थी। सिद्धारमैया का अहिंदा बेहद अहम था जिसका प्रयास पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को सामाजिक तौर पर एकजुट कर साथ लाना था। मोदी ने इसे पहचाना।जिसके बाद उनके भाषण में लगातार बीजेपी के दलितों पर ध्यान केन्द्रित होने की बात कही गई। उन्होंने बीआर अंबेडकर को लेकर पार्टी की प्रतिबद्धता और उनसे जुड़े स्थान की बात की। उन्होंने इस बात पर बोला कि कैसे उनकी योजनाओं ने एससी को मदद की। उन्होंने बोला की कैसे उनकी सरकार ने एससी/एसी कानून को मजबूत करने की दिशा में काम किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद एक दलित नेता थे और बीजेपी ने उन्हें चुनाव में उतारा। जबकि, सोनिया गांधी ने औपचारिक रूप से भी नहीं मुलाकात करना जरूरी समझा।
5-हिन्दू कार्ड
इस चुनाव में कांग्रेस ने मुस्लिमों के समर्थन के साथ हिन्दू की अगड़ी जातियों पर अपना फोकस किया। बीजेपी को इन चुनौतियों से पार पाने के लिए हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण करना था। ऐसा उसी सूरत में हो सकता था जब कांग्रेस को हिन्दू विरोधी दिखाया जाए, अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करनेवाले बताया जाए। मोदी ने इसी दिशा में अपने प्रचार रखा। लगातार इस आरोप के बाद कि कैसे कांग्रेस सरकार में बीजेपी कार्यकर्ताओं को मारा गया जबकि उन साजिशकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। कांग्रेस पर यह आरोप लगाकर कि वह हिन्दू को बांटना चाह रही है ताकि भाई को भाई के साथ लड़ाया जा सके, इसमें उन्होंने लिंगायत को अलग धर्म का हवाला दिया। मोदी आक्रामक रूप से बीजेपी के लिए वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिशें की। उनका यह फॉर्मूला काम किया।

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