क्यों कर्नाटक चुनाव के नतीजे लोकसभा चुनाव 2019 के लिए हैं अहम, जाने पांच वजह

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अगर सिद्धारमैया कर्नाटक चुनाव में दोबारा जीतकर वापसी करते हैं तो वह एक इतिहास बनाएंगे। अब तक कोई भी पार्टी 1985 से लेकर अब तक दोबारा वहां पर नहीं जीत पाई है। राजनीतिक तौर पर काफी उथल-पुथल भरे इस राज्य में 2004 के बाद सिद्धारमैया ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया है। जाहिर तौर पर, कर्नाटक चुनाव नतीजों का असर राज्य के बाहर भी महसूस किया जा सकेगा। यहां पर आइये जानते हैं वो पांच कारण कि आखिर क्यों कर्नाटक नतीजे राष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हैं-
1- मोदी-शाह के लिए दक्षिण का बड़ा टेस्ट
अगर बीजेपी को कर्नाटक में विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाबी मिलती है तो यह नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में अहम दक्षिणी राज्य में पहली जीत होगी। तमिलनाडु और केरल में हुए साल 2016 के विधानसभा चुनावों में पार्टी अपना कुछ खास परफॉर्मेंस नहीं दे पाई थी। तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से अलग होने के बाद बीजेपी ने दक्षिण में अपने अहम सहयोगी को खो दिया।
कुछ मुद्दों पर असहमति जैसे सरकारी दफ्तरों में हिंदी लागू करने का आदेश, पन्द्रहवें वित्तीय आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस जैसी कई चीजें हैं जिसने इन राज्यों में बीजेपी के लिए मुश्किलें पैदा की है। सिद्दारमैया ने बीजेपी के हिन्दुत्व को कन्नड़ राष्ट्रवादी के जरिए चुनौती दी है। ऐसे में बीजेपी की इस जीत से यह तय हो जाएगा कि उसने इन चुनौतियों से पार पा लिया है। लेकिन, अगर बीजेपी असफल रहती है तो बीजेपी की मौजूदा रणनीति पर सवाल उठेगा।
2-कांग्रेस का मुख्य विपक्षी पार्टी कहने का दावा दांव पर
अब तक कर्नाटक ही वह एक मात्र पार्टी है जिसे राज्यभर का समर्थन हासिल है। इसने दक्षिण हिस्से में जेडीएस को चुनौती दी है जबकि अन्य हिस्से में भाजपा को। इसका यह मतलब हुआ कि कांग्रेस का समर्थन राज्य में बढ़ा है ना कि कम हुआ है। इसका मतलब ये हुआ कि कांग्रेस का समर्थन फैला है लेकिन कम हुआ है और उसे ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल करने होंगे ताकि उसे सीट में कन्वर्ट किया जा सके। 2013 के चुनाव को छोड़ दें तो बीजेपी को हमेशा कर्नाटक में कांग्रेस की तुलना में ज्यादा सीट शेयर रहा है। 2013 के चुनाव में सबसे अहम फैक्टर था बी.एस. येदियुरप्पा का बीजेपी से बाहर होना, जिसने वोटों का विभाजन किया। अब वे वापसी कर दोबारा बीजेपी में हैं।अगर कांग्रेस कर्नाटक में अपने बलबूते सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाती है और परिणाम के बाद जेडीएस अहम भूमिका में आती है तो 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के साथ से कड़े सौदेबाजी का सामना करना पड़ेगा। लेकिन, अगर कांग्रेस अपने बलबूते सरकार बनाती है तो बीजेपी के खिलाफ मुख्य विपक्षी दल का दावा करनेवाली इस पार्टी की साख बढ़ेगी।
3-राज्यसभा के आंकड़ों पर असर
कर्नाटक में अगर बीजेपी की जीत होती है तो राज्यसभा में ये जीत उसे बहुमत की ओर लेकर जाएगी। जून 2020 में कर्नाटक से चार राज्यसभा सदस्य रिटायर हो रहे हैं। जिनमें सिर्फ एक बीजेपी के हैं।
4-अहिंदा और हिन्दुत्व की रणनीति में टकराव
कर्नाटक में कांग्रेस की जीत सिद्धारमैया की राजनीतिक रणनीति का एक मजबूत संकेत होगा जो राज्य सरकार की कल्याणकारी योजना अहिंदा (कन्नड़ अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़े वर्ग) को एकजुट करने का प्रयास किया है। इस रणनीति का मकसद है कि सामाजिक तौर पर पिछड़े हुए वर्ग आर्थिक रूप से भी ज्यादातर पिछड़े हैं। सीएसडीएस-लोकनीति की तरफ से चुनाव पूर्व किए गए सर्वे में बड़ी तादाद में लोगों ने यह माना कि उन्हें राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से फायदा पहुंच रहा है। ऐसा करके कांग्रेस दो महत्वपूर्ण समूह लिंगायत और वोकालिंग के महत्व को कम करने की कोशिशें कर रही है।
जबकि, दूसरी तरफ बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर वोट की अपील की है और हिन्दू वोट को एकजुट करने का प्रयास किया है। बीजेपी को अपने एग्जिट पोल में आगे दिखानेवाले चाणक्य ने अपने एनालिसिस में यह बताया कि बीजेपी कुरुबाज जो कि सिद्धारमैया की अपनी जाति समूह है उसे छोड़कर सभी हिन्दू में आगे है। अगर ऐसा होता है तो बीजेपी के हिन्दुत्व और ब्रांड मोदी को एक नया धार मिलेगा।
5-कर्नाटक कांग्रेस के लिए है बड़ा फंडिंग का स्त्रोत
कर्नाटक चुनाव नतीजों का कांग्रेस का वित्त पर बड़ा असर पड़ सकता है। कर्नाटक में हार का कांग्रेस पार्टी के फंड बढ़ाने की क्षमता पर सीधा प्रभाव होगा क्योंकि उसकी पंजाब को छोड़कर किसी अन्य राज्य में निर्वाचित सरकार नहीं है। आय और खर्च के मामले में बीजेपी पहले से ही कांग्रेस के मुकाबले आगे है।

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