इतनी ख़ामोशी से उत्तर कोरिया क्यों गए वीके सिंह

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15 मई को जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे आ रहे थे उसी दिन भारत के विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह उत्तर कोरिया पहुंचे थे.वीके सिंह का यह दौरा हैरान करने वाला था क्योंकि पिछले 20 सालों में यह किसी भारतीय मंत्री का पहला दौरा था. कर्नाटक विधानसभा के चुनावी नतीजे के शोर में मीडिया में इस यात्रा को बहुत तवज्जो नहीं मिली पर इस दौरे की ख़ास अहमियत है.अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि जनरल वीके सिंह की मुलाक़ात उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन से हुई या नहीं. वीके सिंह के इस दौरे को बहुत ही गुमनाम रखा गया.अपने मंत्रियों के हर दौरे और मुलक़ात की तस्वीरों को विदेश मंत्रालय अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से ट्वीट करता है, लेकिन इस दौरे की एक तस्वीर तक नहीं ट्वीट की गई.आख़िर भारतीय विदेश मंत्रालय ने वीके सिंह की यात्रा को इतना गुमनाम क्यों रखा?
इस सवाल के जवाब में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कोरियाई अध्ययन केंद्र की प्रोफ़ेसर वैजयंती राघवन कहती हैं, ”जनरल वीके सिंह के दौरे को गुमनाम रखने का मक़सद यह रहा होगा कि इसे लेकर बहुत अटकलें नहीं लगाई जाएं. उत्तर कोरिया अपने आप में दुनिया का सबसे बदनाम और रहस्यपूर्ण देश है. यहां जाना कोई सामान्य विदेशी दौरा नहीं है. ऐसे में इस देश के दौरे के बारे में कुछ भी बताना या प्रचार करना ख़तरे से खाली नहीं होता. मतलब जो काम बन सकता है उसे भी बिगड़ने की आशंका बनी रहती है.”एक सवाल यह भी उठ रहा है कि किसी राजनयिक पृष्ठभूमि वाले शख़्स को भेजने की तुलना में मोदी सरकार ने पूर्व आर्मी प्रमुख को भेजना क्यों उचित समझा? इस सवाल के जवाब में राघवन कहती हैं कि यह भी रणनीति का हिस्सा हो सकता है.राघवन कहती हैं, ”उत्तर कोरिया को सैन्य दृष्टि से समझने की ज़्यादा ज़रूरत है और संभव है कि सरकार की सोच में यह बात रही होगी. हालांकि भारत चीन के बाद उत्तर कोरिया का दूसरा सबसे बड़ा बिज़नेस पार्टनर है. दोनों देशों के संबंधों में आना-जाना भले कम था लेकिन रिश्तों में ठहराव जैसी स्थिति नहीं थी.”भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने एक बयान में कहा है कि वीके सिंह की मुलाक़ात उत्तर कोरिया के विदेश मंत्री से हुई और कई द्विपक्षीय मुद्दों पर बात हुई है. इस दौरे की रिपोर्ट कोरिया के सरकारी अख़बार रोदोंग सिनमुन में भी छपी है. अख़बार का कहना है कि भारतीय विदेश राज्य मंत्री विजय कुमार सिंह एक प्रतिनिधिमंडल के साथ उत्तर कोरिया पहुंचे और उनकी मेजबानी यहां के विदेश मंत्री ने की.उत्तर कोरिया जब दक्षिण कोरिया से बात कर रहा है और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से शिखर वार्ता करने वाले हैं, ऐसे समय में भारत ने अपने एक मंत्री को भेजने का फ़ैसला किया है. राघवन कहती हैं कि कुछ महीने पहले तक जब उत्तर कोरिया पर अमरीका लगातार प्रतिबंध लगा रहा था तो भारत को भी अमरीकी दबाव में उत्तर कोरिया से व्यापारिक रिश्तों में कटौती करनी पड़ी थी.उत्तर कोरिया से भारत की शिकायत पाकिस्तान से रिश्तों को लेकर रही है. कहा जाता है कि पाकिस्तान ने उत्तर कोरिया को परमाणु शक्ति देने में मदद की और उत्तर कोरिया ने पाकिस्तान को मिसाइल तकनीक दी. दोनों देशों के इस रिश्ते से भारत हमेशा से चिंतित रहा है.जगजीत सिंह सपरा 1997 से 1999 तक उत्तर कोरिया में भारत के राजदूत थे. उन्होंने बीबीसी से कहा, ”हमने जो उत्तर कोरिया में किया वो तो ठीक है लेकिन जो नहीं किया वो और ठीक है. जैसे पाकिस्तान के बारे में कहा जाता है कि उसने परमाणु तकनीक बाइपास किया है. हमने ऐसा कोई काम नहीं किया क्योंकि हम इस नीति पर भरोसा नहीं करते कि किसी को चुपके से कुछ दे दिया जाए.”सपरा ने कहा, ”उत्तर कोरिया में पाकिस्तान के भी राजदूत हैं. मेरी उनसे भी बात होती थी. अब कोई इस बात को स्वीकार तो करेगा नहीं कि उसने तकनीक ट्रांसफ़र किया है. उत्तर कोरिया में तीन साल रहते हुए मैंने कुछ चीज़ों का अवलोकन किया है जिससे शक पैदा होता है.””जब मैं उत्तर कोरिया में था तब पाकिस्तान के वहां दोनों राजदूत आर्मी मैन थे. दिलचस्प है कि दोनों उत्तर कोरिया के शीर्ष नेतृत्व के काफ़ी क़रीब थे. अब वो क्या बात करते थे ये तो लिखित है नहीं लेकिन कुछ तो हो रहा था.”उत्तर कोरिया में जुल्फ़िकार अली भुट्टो से बेनज़ीर भुट्टों तक का दौरा हुआ है. सपरा कहते हैं कि इनके बड़े क़रीब के संबंध थे. जब पाकिस्तानी नेता चीन जाते थे तो उत्तर कोरिया भी चले जाते थे.सपरा ने कहा, ”1998 में भारत ने जब परमाणु परीक्षण किया था तो मैं वहीं था. उत्तर कोरिया पहला देश था जिसने भारत के इस क़दम का समर्थन किया था. उत्तर कोरिया ने कहा था कि भारत को इसकी ज़रूरत थी. उत्तर कोरिया का रुख यह था कि अगर चीन के पास परमाणु बम है तो भारत के पास परमाणु बम क्यों नहीं होना चाहिए?”उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम में पाकिस्तान की भूमिका पर वैजयंती राघवन कहती हैं, ”उत्तर कोरिया के परमाणु प्रोग्राम में पाकिस्तान से काफ़ी मदद मिली है. बेनज़ीर भुट्टो की सरकार में एक्यू ख़ान के ज़रिए उत्तर कोरिया को मदद पहुंचाई गई है. उत्तर कोरिया को पाकिस्तान से रिएक्टर मिले हैं और पाकिस्तान को उत्तर कोरिया से मिसाइल टेक्नॉलजी मिली है.”राघवन ने कहा, ”पाकिस्तान को गौरी मिसाइल की टेक्नॉलजी उत्तर कोरिया से ही मिली है. पाकिस्तान और उत्तर कोरिया में जो कुछ हो रहा था उससे चीन बेख़बर नहीं था, लेकिन उसने नज़रअंदाज किया. बेनज़ीर भुट्टो और उनके पिता उत्तर कोरिया की यात्रा पर जा चुके हैं.”जब रेक्स टिलरसन अमरीका के विदेश मंत्री थे तो उन्होंने भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से उत्तर कोरिया के साथ राजनयिक संबंध ख़त्म करने को कहा था, लेकिन भारत ने इसे ख़ारिज कर दिया था. अब जब अमरीका से उत्तर कोरिया बातचीत करने को राजी हो गया है ऐसे में भारत ने मौक़े को भांपते हुए वीके सिंह को भेजने का फ़ैसला किया.उत्तर कोरिया दुनिया के उन देशों में है जहां कोई भारतीय राजनयिक जाने को तैयार नहीं होता. सपरा भी इस बात को स्वीकार करते हैं कोई वहां राजदूत बनकर नहीं जाना चाहता है. नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद जानी-मानी चीनी अनुवादक जसमिंदर कस्तुरिया को प्योंगयांग में भारतीय राजदूत नियुक्त किया गया था और वीके सिंह के दौरे में कस्तुरिया पूरी सक्रियता के साथ रहीं.

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