सुप्रीम कोर्टः कर्मचारी से ज्यादा काम लेना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं

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सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि कर्मचारी से ज्यादा काम लेना तथा गलती होने पर उसका वेतन रोक देना आत्महत्या करने के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता। ऐसे मामले में वरिष्ठ अधिकारी को सजा नहीं दी जा सकती।एक वरिष्ठ अधिकारी होने के नाते यदि मृतक को कुछ काम दिया गया तो सिर्फ इस बात पर यह नहीं कहा जा सकता कि उसका आपराधिक इरादा रहा होगा। आपात स्थिति में जरूरत के हिसाब से ज्यादा काम करवाया जा सकता है तथा वेतन रोकने की सजा भी दी जा सकती है। इस कार्रवाई को वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगाने के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता। जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा और यूयू ललित की पीठ ने यह कहते हुए महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी वीके खांडके के खिलाफ आईपीसी की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का केस समाप्त कर दिया। अभियुक्त वरिष्ठ अधिकारी थे, जिन्होंने कार्रवाई समाप्त करने के लिए बंबई हाईकोर्ट का रुख किया था। उनके खिलाफ शिकायत उस कनिष्ठ अधिकारी की पत्नी ने दायर की थी, जिन्होंने आत्महत्या कर ली थी। पत्नी ने आरोप लगाया था कि उसके पति मानसिक प्रताड़ना से गुजर रहे थे क्योंकि उसके वरिष्ठ अधिकारी उससे भारी काम ले रहे थे।इससे उन्हें सुबह 10 बजे से रात के 10 बजे तक दफ्तर में रहना पड़ता था। इतना ही नहीं उन्हें कभी भी आफिस बुला लिया जाता था और यहां तक कि छुट्टी वाले भी दिन भी उनसे काम करवाया जाता था। जरा सी गलती होने पर अभियुक्तों ने उसका एक माह का वेतन भी रोक लिया था। उन्हें धमकी दी गई थी कि उनकी वेतन वृद्धि भी रोक दी जाएगी। पत्नी के अनुसार उसके पति शांत रहने लगे थे और उनकी आत्महत्या के लिए अभियुक्त जिम्मेदार हैं।

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हाईकोर्ट ने शिकायत को रद्द करने से इनकार कर दिया। उच्च अदालत ने कहा कि यदि अभियुक्त ऐसे हालात पैदा कर दें कि उस पर भीषण मानसिक दबाव बन जाए और वह आत्महत्या कर ले तो वरिष्ठों को खुदकुशी के लिए उकसाने का जिम्मेदार माना जाएगा।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कोई सुसाइड नोट भी उपलब्ध नहीं है। जो कुछ भी सबूत मौजूद हैं वे मृतक की पत्नी के दावे हैं जो उसने पुलिस के सामने किए हैं। यह सही है कि यदि ऐसी स्थिति पैदा कर दी जाए जहां व्यक्ति आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए तो धारा 306 के लिए कोई जगह बनेगी। लेकिन इस केस के तथ्य कुछ और कहते हैं।

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