कर्नाटकः कांग्रेस-जेडीएस के चुनावी वादों को कैसे पूरा करेगी गठबंधन की सरकार, शपथ लेते ही शुरू हो जाएंगी चुनौतियां

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कर्नाटक में आज कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार बनेगी। आज शाम जैसे ही कुमारस्वामी मुख्यमंत्री और जी परमेश्वर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे वैसे ही दोनों दलों के सामने कई चुनौतियां सामने होंगी। दरअसल दोनों दलों ने चुनाव से पहले वोटरों को लुभाने के लिए कई वादे किये थे। इन वादों को पूरा करने के लिए कांग्रेस और जेडीएस को कई नई मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा।
किसान कर्ज माफी
गठबंधन सरकार बनने के बाद जेडीएस के सामने सबसे पहले अपने चुनावी वादों को पूरा करना का दबाव होगा। इसमें सबसे पहले आता है किसानों की कर्ज माफी। दरअसल जेडीएस ने चुनाव से पूर्व कर्नाटक के लोगों से ये वादा किया था कि उनकी सरकार बनते ही वे किसानों का सारा कर्ज माफ कर देंगे वो भी बिना किसी शर्त के। ये कर्ज सारे किसी राष्ट्रीयकृत बैंक को हों या किसी को-ऑरेटिव बैंक के, सभी को माफ कर दिया जाएगा।इससे पहले सिद्धारमैया सरकार ने को-ऑपरेटिव बैंक से लिये गए किसानों के 50 हजार रुपये तक के कर्ज को माफ कर दिया था। सरकार के इस फैसले से प्रदेश पर 8165 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ा था। वहीं अगर जेडीएस के कर्ज माफी की बात करें तो ये आंकड़ा पूर्व की कांग्रेस सरकार से लगभग 7 गुना ज्यादा है। यानी अगर जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार ऐसा करती है तो प्रदेश पर 53 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ेगा।इतना ही नहीं जेडीएस ने ये भी कहा था कि अगर उनकी सरकार आती है तो वो अगले पांच साल में डेढ़ लाख (150000) करोड़ रुपये खर्च कर लंबित पड़े सभी कृषि परियोजनाओं को पूरा करेंगे। वहीं दूसरी तरफ इसी मद में कांग्रेस ने एक लाख 25 हजार (125000) करोड़ रुपये खर्च करने की बात कही थी।
कांग्रेस के प्रोजक्ट में गड़बड़ी का आरोप
वहीं सिद्धारमैया सरकार में जब जेडीएस विपक्ष की भूमिका में थी तब इनलोगों ने कांग्रेस सरकार के 12193 करोड़ रुपये के येत्तिनाहोल प्रोजक्ट का विरोध किया था। ये प्रोजेक्ट कर्नाटक के कई जिलों में लोगों तक पानी पहुंचाने का था। जेडीएस ने इस परियोजना में गड़बड़ी का आरोप लगाया था।जेडीएस ने कहा था कि इस प्रोजेक्ट को पूरा नहीं किया जाना चाहिए क्यों कि इससे तटीय इलाकों में रहने वाले लोग पानी के कटाव का विरोध कर सकते हैं। लेकिन अब जेडीएस और कांग्रेस में गठबंधन है और ये अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ये प्रोजेक्ट पूरा होगा या नहीं। या जांच में इसमें गड़बड़ियां पाई जाती हैं तो क्या होगा।
कांग्रेस की जाति जनगणना पर जेडीएस ने उठाए थे सवाल
प्रदेश की पूर्व कांग्रेस सरकार ने एक विवादास्पद जाति की जनगणना की थी लेकिन चुनाव साल में मतदाताओं के प्रतिक्रिया की वजह से इसे जारी नहीं किया गया था।इस जाति की जनगणना के आंकड़े को कांग्रेस सरकार ने उचित ठहराया था और कहा कि यह सरकारी सब्सिडी और कार्यक्रमों को लोगों तक पहुंचाने में और अधिक पारदर्शी और बेहतर होगा। इस जनगणना की जेडीएस की ओर गंभीर आलोचना की गई थी। लेकिन अब ये देखना दिलचस्प होगा कि नई सरकार में इस जनगणना को जारी किया जाता है या नहीं।
लोक आयुक्त को मजबूत करने की चुनौती
सिद्धारायमिया सरकार ने लोक आयुक्त संस्थान के समानांतर भ्रष्टाचार रोधी नियामक (एंटी करप्शन ब्यूरो) बनाकर उसे कमजोर कर दिया था। इसकी भी आलोचना की गई थी। कुमारस्वामी समेत आलोचकों ने कहा था कि एसीबी राजनीतिक नियंत्रण में है और इसका इस्तेमाल सरकार पर लगे भ्रष्टाचार की शिकायतों को दबाने के लिए किया जा सकता है। कुमारस्वामी ने इस बात का भी वादा किया था कि सत्ता में आने के बाद वे लोक अयुक्त को फिर से मजबूत और सशक्त करेंगे। अब इस मोर्च पर सरकार का क्या रुख होता है ये भी देखने वाली बात होगी।
सामाजिक कल्याण की घोषणा
सामाजिक कल्याण के लिए जेडीएस ने घोषणा की थी कि 65 वर्ष से अधिक उम्र के प्रत्येक व्यक्ति को प्रति वर्ष 6,000 रुपये पेंशन दिया जाएगा। कृषि कार्यों से 5000 रुपये प्रति महीना कमाने वाली सभी वर्ग की महिलाओं को प्रति माह 2,000 रुपये की सहायता दी जाएगी। इसके अलावा वकीलों और उनके एसोसिएशन के लिए 100 करोड़ रुपये मंजूर करने और सभी ट्रेनी वकीलों को 5000 रुपये प्रति माह स्टाइपन देने की भी बात कही गई थी। इन सभी योजनाओं के लिए पैसे कहां से आएंगे ये नए गठबंधन सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
पूर्व सरकार की सब्सिडी स्कीम
इसके अलावा सिद्धारमैया सरकार की सब्सिडी वाली स्कीम जैसे अन्ना भाग्य, कशीरा भाग्य, शादी भाग्य और दूसरी अन्य परियोजनाओं जैसे ‘इंदिरा कैंटिन’ परियोजनाओं का क्या होगा। ये भी देखना होगा। वहीं दूसरी तरफ जेडी (एस) अपने नेता देवेगौड़ा का सम्मान करने और इंदिरा कैंटीन का मुकाबला करने के लिए ‘अप्पाजी कैंटीन’ चला रही है।इन सभी योजनाओं के लिए धन उगाही करना और साथ ही साथ कौन-कौन सी योजनाओं को चलना है या बंद करना है इस पर दोनों पक्षों की सहमति भी गठबंधन सरकार को लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों की भी मानें तो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाना और घोषणा पत्रों के वादे को पूरा करने के लिए पैसों का इंतजाम करना दोनों दलों के लिए आसान नहीं होगा।

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