विश्व पयार्वरण दिवस 2018: बड़े शहरों की ‘धमनियों’ में फंस रहा प्लास्टिक कचरा

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देश की राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई समेत आठ शहर ऐसे हैं, जो ठहरते-थमते नहीं है। लेकिन प्लास्टिक का कचरा इनकी रफ्तार के आड़े आया है। देश की अर्थव्यवस्था की दशा-दिशा तय करने वाले ये शहर मामूली बारिश भी सहने की स्थिति में नहीं है। कुछ ही मिनटों में गली-मोहल्ले डूब जाते हैं और जनजीवन ठप हो जाता है। बड़े शहरों की धमनियों में लगातार फंसते और बढ़ते प्लास्टिक कचरे को नहीं निकाला गया, तो आने वाले समय में संकट और गहरा सकता है।चारों ओर बिखरी पॉलीथीन के चलते ड्रेनेज सिस्टम ध्वस्त होता जा रहा है और जरा-सी बारिश में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो रही है। चार महानगरों (दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई) समेत बेंगलुरु, हैदराबाद, लखनऊ, देहरादून, रांची और पटना की बात करें, तो देश की पांच फीसदी से ज्यादा आबादी इन्हीं शहरों में रहती है। देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने में भी ये शहर अहम योगदान दे रहे हैं, लेकिन ये शहर प्लास्टिक के बोझ तले दबे जा रहे हैं। .कितनी बारिश झेलने में सक्षम : आखिर आपका शहर कितनी बारिश झेल सकता है? पहले देश के दो प्रमुख शहरों की बात करते हैं। हर बार जरा सी बारिश में ‘पानी-पानी’ हो जाने वाली मुंबई महज 25 मिलीमीटर प्रति घंटे की बारिश ही झेल सकती है। इसके बाद शहर में नाव चलाने की नौबत आ जाएगी। इसी तरह देश की राजधानी दिल्ली लगातार 60 मिलीमीटर बारिश ही झेल सकती है। आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर ए. के. गोसाईं की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की ड्रेनेज व्यवस्था को जाम करने का सबसे बड़ा कारण है प्लास्टिक कचरा। प्लास्टिक कचरा उत्पादन में देश की राजधानी सबसे ऊपर है। आजादी से पहले कभी देश की राजधानी के रूप में पहचाने जाने वाले कोलकाता में कुल प्लास्टिक कचरे का दसवां हिस्सा ही रिसाइकल हो पाता है। ‘सिलीकॉन वैली’ के नाम से मशहूर बेंगलुरु आईटी सेक्टर की वजह से दुनियाभर में मशहूर हो चुका है। मगर विकास के साथ-साथ शहर में प्लास्टिक कचरा भी बढ़ता जा रहा है। इस कारण ड्रेनेज नेटवर्क की क्षमता भी आधी ही रह गई है। 2015 में *बाढ़ का दंश झेल चुके चेन्नई की हालत भी ऐसी ही है।
दिल्ली : प्लास्टिक कचरा पैदा करने में सबसे आगे
60 मिलीमीटर बारिश से ही जलभराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है.

689.52 टन प्लास्टिक कचरा हर रोज देश की राजधानी में पैदा होता है, लेकिन रिसाइकल व्यवस्था बेहद कमजोर .
50 माइक्रोन से कम की प्लास्टिक दिल्ली में प्रतिबंधित, पर इसका पालन नहीं

मुंबई : चंद मिनटों में सड़कें बन जाएंगी ‘समुद्र’
‘ 25 मिलीमीटर प्रति घंटे की बारिश ही झेल सकती है मुंबई.

‘ 9400 मीट्रिक टन कचरा रोज निकलता है, इसमें 3% प्लास्टिक कचरा शामिल .

‘ 1987 किलोमीटर लंबे खुले नालों में से अधिकांश कचरे की वजह से जाम, बरसाती पानी की निकास प्रणाली 525 किमी लंबी
कोलकाता : रिसाइक्लिंग की ओर धीमे कदम
‘ 75 मिलीमीटर बारिश झेलने की क्षमता शहर के ड्रेनेज सिस्टम में .

‘ 4-6 फीसदी इलाकों में जलभराव की समस्या प्लास्टिक कचरे से होती है .

‘ 5 फीसदी से ज्यादा कचरा प्लास्टिक का, कुल प्लास्टिक कचरे का दसवां हिस्सा ही रिसाइकिल हो पाता है
बेंगलुरु : ड्रेनेज नेटवर्क की क्षमता आधी रह गई

‘ 45 मिलीमीटर प्रति घंटे की बारिश झेलने में ही सक्षम है बेंगलुरु अभी.

‘ 80 मिलीमीटर प्रति घंटे बारिश झेलने की वास्तविक क्षमता थी इसकी.

‘ 4000 टन कचरा रोज शहर में पैदा होता है, 20 फीसदी कचरा प्लास्टिक का .

‘ 16 किलो प्लास्टिक कचरा औसतन एक व्यक्ति पैदा करता है शहर में .

‘ 400 से अधिक जल निकासी स्थानों को कचरा मुक्त करने की जरूरत है.

‘ 1000 टन प्लास्टिक कचरा जब्त हुआ 1.8 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया
लखनऊ : 71 फीसदी से अधिक नालों में कचरा भरा

शीर्ष शहरों में शामिल देश में तेजी से नौकरी के अवसर बनाने के लिए.

लाख है उत्तर प्रदेश की राजधानी की जनसंख्या.

करोड़ डॉलर जीडीपी शहर की.

‘ 100-120 टन रोजाना पॉलीथिन और प्लास्टिक कचरा पैदा हो रहा.

‘ 50 फीसदी से ज्यादा शिकायतें नाले जाम होने की .

‘ 1500 मीट्रिक टन कचरा हर रोज पैदा करता है लखनऊ .

‘ 28 में से 20 प्रमुख नाले कचरे की वजह से जाम.

‘ 33 फीसदी शहर ही निकासी सिस्टम से जुड़ा हुआ है

हैदराबाद : प्लास्टिक से उपजी गाद जाम की बड़ी वजह

‘ 30 मिलीमीटर लगातार बारिश ही झेल सकता है, 30 फीसदी नालों से निकली गाद प्लास्टिक कचरा .

‘ 4500 मीट्रिक टन कचरा रोज निकलता है शहर में, 5 फीसदी कचरा इसमें प्लास्टिक का .

‘ 40 फीसदी कचरा नाले में जाता है, जिससे नाले जाम होने की समसया सामने आती है .

‘ 90 फीसदी नाले कचरे की वजह से बंद रहते हैं, 880 चोक प्वाइंट हैं हैदराबाद शहर में .

लाख सॉफ्टवेयर पेशेवर शहर में.

करोड़ डॉलर का निर्यात आईटी से .

हैदराबाद में स्टार्टअप यूनिट चल रहीं.

लाख जनसंख्या शहर की

इस शहर से सीखें सफाई

मध्य प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर को लगातार दूसरे साल देश का सबसे साफ-सुथरा शहर घोषित किया गया है। ऐसा कैसे संभव हो सका, इस पर नजर डालते हैं-.

‘कचरा फैलने का बड़ा कारण पॉलिथीन थी। जुर्माने का प्रावधान किया तो लोगों ने इस्तेमाल कम कर दिया। दुकानदार भी मानक स्तर की ही पॉलिथीन देने लगे।.

‘इंदौर नगर निगम ने सबसे पहले शहर से कचरा पेटियां हटाईं। घर-घर से कचरा एकत्र किया गया। दुकानों से रात को कचरा लिया गया और बाजारों की सफाई प्रारंभ की गई।.

‘नगर निगम ने लीक से हटकर 3.3 क्यूबिक मीटर क्षमता वाली कचरा गाड़ियां बनवाईं, जो एक हजार घरों से कचरा लेने की क्षमता रखती हैं। पहले यह क्षमता 300 घरों तक सीमित थी।.

‘शहर में सफाई का सिलसिला 24 घंटे चलता है। महिलाएं गीला और सूखा कचरा अलग करके नगर निगम को सौंपती हैं।.

‘बच्चे सफाई के एंबेसेडर बनाए गए, ताकि घरों में सफाई में कमी रहने पर वे बड़ों को भी टोक सकें। स्कूल और कॉलेजों में स्वच्छता समितियों का गठन किया गया।.

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