रणनीतिक साझेदारी से रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ेगा

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विदेशी निवेश के दरवाजे खोले जाने के बावजूद रक्षा क्षेत्र में निवेश नहीं आ रहा है। रक्षा मंत्रालय इसे लेकर चिंतित है। मंत्रालय की योजना अब यह है कि इसके लिए रणनीतिक साझेदारी में बनने वाले रक्षा उपकरणों की खरीद को बढ़ाया जाए ताकि विदेशी कंपनियां भारत में ही अपने कारखाने स्थापित करने की पहल करें।एनडीए सरकार ने रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी की थी। लेकिन इसके बावजूद विदेशी निवेश के प्रस्ताव नहीं मिले। इसके बाद नियमों में फिर बदलाव किया। यह जोड़ा गया है कि यदि आधुनिक प्रौद्यौगिकी मिल रही हो तो निवेश की अनुमति 100 फीसदी तक दी जा सकती है। जबकि पूर्व में अत्याधुनिक प्रौद्यौगिकी पर ही 49 फीसदी से ज्यादा के निवेश की मंजूरी दी जा सकती थी। लेकिन इस बदलाव के बाद भी सार्थक नतीजे नहीं निकले। जो निवेश प्रस्ताव मिले हैं, वह महज कुछ करोड़ों के हैं।लेकिन सरकार हिम्मत नहीं हार रही है। अब सरकार ने फिर पहल की है। रक्षा सौदों में मेक इन इंडिया की शर्त जोड़नी शुरू कर दी गई है। इधर, जितने भी रक्षा सौदों को मंजूरी दी जा रही है, उसमें यह प्रावधान जोड़ा जा रहा है कि निर्माण देश में ही किया जाए। इससे निवेश की उम्मीद बढ़ रही है क्योंकि कंपनियां पहले ऑर्डर हासिल करेंगी, उसके बाद रणनीतिक साझेदारी में निर्माण शुरू करेंगी।रक्षा सचिव संजय मित्रा के अनुसार सरकार चाहती है कि विदेशी कंपनियां भारतीय कंपनियों से रणनीति साझेदारी करके देश में ही रक्षा साजो-सामान का निर्माण करें। इससे रक्षा क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा। उन्होंने भरोसा जताया कि रणनीति साझेदारी से आने वाले समय में विदेशी निवेश में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। बता दें कि हाल में रक्षा मंत्रालय ने वायुसेना के लिए 110 लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए आपूर्तिकर्ताओं से जो प्रस्ताव मांगे हैं, उनमें रणनीतिक साझेदारी पर जोर दिया गया है। ताकि विमानों का निर्माण देश में ही हो। आगे भी रक्षा सौदों में यही फॉर्मूला अपनाया जाएगा।

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