प्रणब मुखर्जी के भाषण ने भारत के गौरवशाली इतिहास की याद दिलाई: RSS

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आरएसएस ने कहा है कि संघ मुख्यालय में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने भाषण में देश के गौरवशाली इतिहास की याद दिलाई। उन्होंने समावेशी, बहुलतावाद एवं विविधता में एकता को ‘भारत की आत्मा’ बताया। आरएसएस के प्रचार प्रमुख (आधिकारिक प्रवक्ता) अरुण कुमार ने बताया, ”मुखर्जी के भाषण ने राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास की याद दिलायी।देश की 5,000 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत की याद दिलायी। हमारी राज्य प्रणाली भले ही बदल सकती है लेकिन हमारे मूल्य वही रहेंगे। उन्होंने समावेशी , बहुलवाद और विविधता में एकता को भारत की आत्मा बताया। उन्होंने कहा, ”कार्यक्रम में शामिल होने और संवाद राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति की विचारधारा के ही गिर्द रखने के लिये हम लोग उनका धन्यवाद करते हैं।पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के बहुप्रतिक्षित कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मैं यहां राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति पर बात करने आया हूं। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा बहुलतावाद एवं सहिष्णुता में बसती है। पूर्व राष्ट्रपति ने अपने 30 मिनट के भाषण का अंत धन्यवाद, जय हिंद और वंदेमातरम् बोल कर किया।मुखर्जी ने कहा कि भेदभाव, नफरत से भारत की पहचान को खतरा है। उन्होंने कहा कि सहनशीलता हमारे समाज का आधार है। उन्होंने कहा कि असहिष्णुता केवल हमारी राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करेगी। राष्ट्रवाद किसी धर्म और भाषा में बंटा नहीं है। मुखर्जी ने कहा कि भारत के लोग 122 से ज्यादा भाषा और 1600 से ज्यादा बोलियां बोलते हैं। यहां सात बड़े धर्म के अनुयायी हैं और सभी एक व्यवस्था, एक झंडा और एक भारतीय पहचान के तले रहते हैं। अपने भाषण के जरिए मुखर्जी ने विरोध के बावजूद संघ के कार्यक्रम में जाने का कारण भी बताया।उन्होंने कहा कि मुझे भारत पर अपनी बात रखनी है। साथ ही मैं यहां राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति पर बात करने आया हूं। तीनों को अलग-अलग रूप में देखना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि सबका साथ जरूरी है। इससे पहले कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संघ सिर्फ हिंदुओं का संगठन नहीं है। संघ एक लोकतांत्रिक संगठन है। उन्होंने कहा कि सरकारें बहुत कुछ कर सकती हैं, लेकिन सब कुछ नहीं कर सकती हैं।देशभक्ति का मतलब देश के प्रति आस्था है। सबने मिलकर देश को उन्नत बनाया है। मुखर्जी ने कहा कि राष्ट्रीयता देश के प्रति समर्पण और आदर का नाम है।भारत का राष्ट्रवाद यूरोपीय राष्ट्रों से अलग है। भारत का राष्ट्रवाद वसुधैव कुटुंबकम में है। हमारी राष्ट्रीय पहचान हासिल करने की एक लंबी प्रक्रिया रही है। इसमें भाषिक और धार्मिक विविधता के लिए पूरी जगह है। भारत के राष्ट्रवाद में सारे लोग समाहित हैं।जब किसी महिला या बच्चे के साथ बर्बरता होती है, तो देश का नुकसान होता है। हिंसा से डर का भाव आता है। हमें शारीरिक-मौखिक हिंसा को नकारना चाहिए। लंबे वक्त तक हम दर्द में जिए हैं। शांति, सौहार्द्र और खुशी फैलाने के लिए हमें संघर्ष करना चाहिए।मुखर्जी के संघ के कार्यक्रम में शामिल होने पर विवाद के बीच संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि यह निरर्थक बहस है और उनके संगठन के लिए कोई भी बाहरी नहीं है। कार्यक्रम के बाद मुखर्जी वही बने रहेंगे जो वह हैं और संघ भी वही बना रहेगा जो वह है। संघ पूरे समाज को एकजुट करना चाहता है और उसके लिए कोई भी बाहरी नहीं है। लोगों के पास अलग-अलग विचार हो सकते हैं लेकिन वे सभी भारत माता के बच्चे हैं।

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