मूक-बधिर और दृष्टि बाधितों को एमबीबीएस में प्रवेश नहीं मिलेगा

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पिछले साल लागू हुआ नया विकलांगता अधिकार कानून भी मूक-बधिर और दृष्टिबाधित छात्र-छात्राओं का डॉक्टर बनने का सपना पूरा करने में मदद नहीं कर सका है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने 40 फीसदी से अधिक दृष्टिबाधित और मूक-बधिर छात्रों को एमबीबीएस में प्रवेश नहीं देने की अनुशंसा की है, जिसे केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया है। मालूम हो, 40 फीसदी से कम विकलांगता वाले मूक-बधिर और दृष्टिबाधित छात्र पहले से ही सामान्य श्रेणी में माने जाते हैं। पिछले साल नि:शक्त जन अधिकार कानून-2016 के लागू होने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने एमसीआई को एमबीबीएस प्रवेश में भी नि:शक्त जनों के प्रवेश के नियमों को अनुकूल बनाने का निर्देश दिया था। पिछले सप्ताह एमसीआई ने अपनी अनुशंसाएं मंत्रालय को सौंप दी थी। इनके मुताबिक, 40 फीसदी से अधिक दृश्य बाधित और श्रव्य बाधित प्रतिभागियों को एमबीबीएस में प्रवेश के लिए उपयुक्त नहीं माना गया है। इसी तरह, बौद्धिक विकलांगता के मामलों जैसे कि लर्निंग डिसेबिलिटी, ऑटिज्म और मेंटल इलनेस में भी एक स्तर से अधिक विकलांगता वाले छात्रों को एमबीबीएस में प्रवेश देने से मना किया गया है। एमसीआई ने लोकोमोटर विकलांगता के मामले में बड़ी राहत दी है। कमर के नीचे 40 फीसदी तक विकलांगता को ही एमबीबीएस के लिए मंजूरी देने के पुराने नियम को खत्म करते हुए 80 फीसदी लोकोमोटर विकलांगता वालों को भी पाठ्यक्रम में प्रवेश में मंजूरी दी गई है। लेकिन आरक्षण का लाभ 40 फीसदी से कम विकलांगता वालों को नहीं मिलेगा। सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय शुरू में एमसीआई के इस दिशानिर्देश में विकलांगों को ज्यादा राहत न मिलने से चिंतित था। हालांकि, केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से मंत्रणा के बाद उसने इन दिशानिर्देशों को अपनी मंजूरी दे दी।
दिशानिर्देश बनाने वाली समिति के अध्यक्ष के डॉक्टर वेदप्रकाश मिश्र ने कहा, हमने एमबीबीएस के लिए आवश्यक शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य का ध्यान रखते हुए तर्क, वैज्ञानिक साक्ष्यों एवं विशेषज्ञों की अनुशंसा के आधार पर यह दिशानिर्देश बनाएं हैं।

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