MSP में बढ़ोत्तरी: किसानों ने फसलों की लागत के फार्मूले पर सवाल उठाए

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एमएसपी बढ़ाने के सरकार के फॉर्मूले से किसान खुश नहीं है। किसान नेताओं और संगठनों का कहना है कि लागत में खेत की रेंटल वैल्यू और मजदूरी भी शामिल होनी चाहिए। किसान नेताओं का कहना है कि फसलों की उत्पादन लागत डीजल समेत हर वस्तु की महंगाई को ध्यान में रखा जाना चाहिए था। एमएसपी की घोषणा सिर्फ 25 फसलों के लिए की जाती है, अन्य उपज का भी सरकार ध्यान रखे।
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लागत का फॉर्मूला ही गलत : राकेश टिकैत
भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत कहते हैं कि एमएसपी का अब कोई मतलब नहीं है। स्वामीनाथन आयोग ने लागत पर डेढ़ गुना बढ़ाकर फसलों के दाम तय करने की सिफारिश की थी और भाजपा ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में इसका वादा किया। अब सरकार फसलों की लागत तय करने के फार्मूले में ही गड़बड़ी कर रही है। टिकैत ने कहा कि केवल 14 फसलों के ही क्यों, सभी खरीफ फसलों के दाम इसी आधार पर बढ़ाए जाएं।किसान नेता श्याम सिंह चाहर का कहना है कि पूर्व में भी समर्थन मूल्य बढ़ा था, मगर लागत के अनुसार नहीं बढ़ सका। खरीफ की फसलों में जो वृद्धि हुई है। इसका जमीन स्तर पर किसानों को लाभ मिले, तब यह फैसला किसानों के हित में होगा। भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद विजयपाल तोमर ने कहा कि फसलों की लागत तय करने की जो व्यवस्था है उसमें डीएम की अध्यक्षता वाली समिति राज्य सरकार को रिपोर्ट भेजती है। राज्य सरकार केंद्र सरकार को भेजती है और वहां से कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) को रिपोर्ट जाती है। सीएसीपी जो लागत तय करता है उसी पर 50 फीसदी बढ़ाकर खरीफ फसलों का समर्थन मूल्य घोषित किया गया है। तोमर ने कहा कि लागत तय करने की यही व्यवस्था आजादी के बाद से चली आ रही है। इसमें किसान प्रतिनिधियों की भी राय ली जाती है। जद यू महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि मौजूदा लागत मूल्य निर्धारण एटूएफल यानी खेती के लागत मूल्यों एवं पारिवारिक पारिश्रमिकी को आधार मानकर फसल की लागत मूल्य के समकक्ष एमएसपी बढ़ाया गया है जबकि किसान संगठन सी-2 प्रणाली अर्थात लागत मूल्य, पारिवारिक श्रम, तथा भूमि के किराये को जोड़ने की मांग करते आ रहे हैं। मथुरा और मैनपुरी के किसानों का कहना है कि सरकार आलू, लहुसन की बर्बादी रोकने के लिए भी सरकारी खरीद की व्यवस्था कराए। एटा और फिरोजाबाद के किसानों ने एमएसपी के बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन किया। समूचे जिले में मक्का, बाजरा, धान की फसलों की बुवाई-रोपाई अधिकांश किसान करते है। हालांकि क्रय केन्द्रों पर सरकार ने निर्धारित रेटों पर फसलों का खरीदारी नहीं की जाती है इससे किसान खरीफ फसलों से दूरी बना रहे हैं। फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) करता है। सीएसीपी तीन आधारों पर उत्पादन लागत तय करता है। इसमें ए2 (वास्तव में ख़र्च की गई लागत), ए2+एफएल (वास्तव में ख़र्च की गई लागत + पारिवारिक श्रम का अनुमानित मूल्य) और सी2 (समग्र लागत, जिसमें स्वामित्व वाली भूमि और पूंजी के अनुमानित किराये और ब्याज को भी शामिल किया जाता है)। स्वामीनाथन आयोग का कहना है कि समग्र लागत पर 50 फीसदी का इजाफा होना चाहिए। कृषि नीति विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन लागत का मतलब समग्र लागत होनी चाहिए। अन्यथा महंगाई और अन्य बढ़ते खर्चों को जोड़ लिया जाए तो बढ़ोतरी बेहद मामूली साबित होगी। पिछले तीन-चार सालों में बढ़ोतरी पहले ही काफी कम हुई है, ऐसे में अगर लागत में सभी कारणों को नहीं जोड़ा जाएगा तो फर्क नहीं पड़ेगा।

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