मानसून के रहस्य को सुलझाने में साथ काम करेंगे भारत-अमेरिका

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कई अध्ययनों के बावजूद मानसूनी हवाओं के कई पहलु आज भी रहस्य बने हुए हैं। इन्हीं रहस्यों पर पर्दा उठाने के लिए अमेरिका और भारत ने मिलकर काम करने का फैसला किया। इसी कड़ी में भारत का हिंद महासागर शोध पोत ‘सागर निधी’ शुक्रवार को चेन्नई से रवाना हुआ। यह बंगाल की खाड़ी में रहकर भारत में 70 फीसदी बारिश के लिए जिम्मेदार दक्षिण पश्चिमी मानसून के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करेगा।
कार्यक्रम के तहत सागर निधि एक महीने तक बंगाल की खाड़ी में तैरकर समुद्र की विभिन्न गहराई और स्थानों से आंकड़ा एकत्र करेगा। इन आंकड़ों का इस्तेमाल समुद्र के ऊपरी सतह और वायुमंडल के संपर्क से उत्पन्न प्रभाव के अध्ययन के लिए किया जाएगा। वहीं सागर निधी से एकत्र आंकड़ों का मिलान अमेरिका शोध पोत ‘थॉमस जी थॉम्पसन’ से लिए गए आंकड़ों से किया जाएगा। बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान से सबद्ध पृथ्वी विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष देबासीस सेन को परियोजना का मुख्य समन्वयक बनाया गया है। उन्होंने कहा, आज भी यह पहेली है कि क्यों मानसून हवाएं होने के बावजूद कई- कई दिनों तक बारिश नहीं होती। यह तय नहीं है कि इसमें समुद्र की भूमिका क्या है? खासतौर पर हवाओं के उत्तरी हिंद महासागर के सतह होने वाले जटिल संपर्क का क्या प्रभाव पड़ता है। सेन ने कहा, मौजूदा वायुमंडलीय मॉडल मानसून के इस ठहराव का पूर्वानुमान लगाने में बेहतर नहीं है। हम सात दिन से अधिक का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते। ये मॉडल मानसूनी बादलों की भौतिकता भी समझने में सक्षम नहीं है। ना ही समुद्र और हवा के संपर्क से पड़ने वाले असर को इसमें समाहित किया गया है। ऐसे में लंबे समय के लिए सटीक पूर्वानुमान आज भी चुनौती है। पुणे स्थित भारतीय उष्ण देशीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के पूर्व निदेशक बीएन गोस्वामी ने कहा, किसानों और नीति निर्माताओं के लिए यह जानना अहम है कि कब और कितने दिन तक मानसून सक्रिय रहेगा। उन्होंने कहा, इस उप मौसमी बदलावों का सटीक पूर्वानुमान लगाना आवश्यक है। साथ ही मीठे पानी के समुद्र में मिलने के असर को भी समझना है। भारत में बारिश के मौसम में मानसून का मनमौजी व्यवहार से अकसर मुश्किलें पैदा होती हैं। अगर लगातार मानसून सक्रिय रहा तो कई इलाकों में बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। वहीं कई दिनों तक मानसून की निष्क्रियता से सूखे की स्थिति पैदा हो जाती है। इसलिए इस अध्ययन से पूर्वानुमान लगाने और हालात से निपटने के लिए बेहतर तैयारी का मौका मिलेगा। दोनों देशों की संयुक्त शोध परियोजना को 2013 को मानसून मिशन के तहत शुरू की गई थी। भारत की ओर से पृथ्वी मंत्रालय परियोजना के लिए वित्त मुहैया करा रहा है। जबकि अमेरिका की ओर से यूएस ऑफिस ऑफ नेवल रिसर्च संसाधन मुहैया कराता है।

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