फेल न करने की नीति से एक पीढ़ी का नुकसान हुआ : प्रकाश जावड़ेकर

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स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों में पढ़ने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। दूसरी तरफ, प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा गुणवत्ता की चुनौतियों से तो जूझ ही रही है, दिनोंदिन महंगी भी होती जा रही है। इधर, सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में कई बदलावों की शुरुआत की है। शिक्षा क्षेत्र के इन्हीं मुद्दों और चुनौतियों को लेकर मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से हिन्दुस्तान के ब्यूरो प्रमुख मदन जैड़ा ने लंबी बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश-
सबसे ज्यादा बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, पर उनकी गुणवत्ता दिन-प्रतिदिन खराब हो रही है। अब गांवों में भी लोग अपने बच्चे निजी स्कूलों में भेज रहे हैं, ऐसा क्यों?
स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता खराब होने की कई वजहें हैं। सबसे बड़ी वजह है शिक्षा के अधिकार कानून के तहत पहली से आठवीं तक परीक्षा को खत्म कर देना। इससे पिछले करीब दस साल में एक पीढ़ी का नुकसान हुआ है, क्योंकि परीक्षा नहीं होगी, तो किसी की भी जवाबदेही नहीं होगी। न छात्र की और न शिक्षक की। राज्यों ने इस पर चिंता जताई, तो 24 राज्यों के अनुरोध पर हमने इस नीति को खत्म करने की दिशा में पहल कर दी है। भविष्य में पांचवीं और आठवीं कक्षाओं में परीक्षा को अनिवार्य किया जा रहा है। हम फेल होने वाले बच्चों को एक और मौका देंगे। इससे पढ़ने और परीक्षा का माहौल बनेगा। दूसरा कार्य हमने ‘लर्निंग आउटकम’ को लेकर किया है। इसका मतलब है कि शिक्षा का हासिल क्या हो? यानी किसी छात्र को इतना तो कम से कम आना ही चाहिए, यह इसका लक्ष्य है। ‘नेशनल एसेसमेंट सर्वे’ और अन्य बाहरी सर्वेक्षणों में अक्सर यह बात आती है कि आठवीं के बच्चे पांचवीं कक्षा का गणित नहीं कर सकते। सातवीं का छात्र चौथी का पाठ नहीं पढ़ सकता। यह स्थिति है, तो खराब है। इसे सुधारेंगे नहीं, तो उच्च शिक्षा में कैसे छात्र जाएंगे?
सवाल शिक्षकों की गुणवत्ता पर भी उठते हैं, जब अच्छे शिक्षक ही नहीं होंगे, तो छात्रों की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी?यह सही है। हमने देखा है कि देश भर में 14 लाख ऐसे शिक्षक हैं, जो सिर्फ 12वीं तक पढे़ हैं। उनके पास कोई पेशेवर योग्यता नहीं है। इसलिए उन्हें प्रशिक्षण देने का कार्य शुरू किया गया है। ऑनलाइन कोर्स के जरिये वे प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। मार्च 2019 में उनकी परीक्षा होगी तथा उन्हें ‘डिप्लोमा इन एजुकेशन’ हासिल करना होगा। तभी वे आगे पढ़ा पाएंगे। उम्मीद है, इस कदम से भी प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी।
आर्थिक रूप से कमजोर 25 फीसदी बच्चों को निजी स्कूलों में आठवीं तक मुुफ्त शिक्षा दी जाती है। लेकिन अब जब वे नौवीं में जा रहे हैं, तो निजी स्कूलों की फीस कैसे भर पाएंगे?
कानून लागू होने के बाद पहला बैच नौवीं कक्षा में पहुंचा होगा। हम इसका अध्ययन करेंगे कि इसमें क्या समस्याएं आ रही हैं और कैसे इसका समाधान हो सकता है।
स्कूली शिक्षा में जहां सरकारी स्कूल फिसड्डी हैं, वहीं उच्च शिक्षा में सरकारी संस्थान तो अच्छे हैं, लेकिन निजी संस्थानों की गुणवत्ता बेहद खराब हैै। इस स्थिति को आप कैसे नियंत्रित करेंगे?
यह समस्या तो है। लेकिन इस समस्या को तकनीक ने काफी हद तक आसान किया है। आज कोई भी छात्र कॉलेज में एडमिशन से पहले उसकी गुणवत्ता, उसमें पढ़ने वाले छात्रों की संख्या और प्लेसमेंट का रिकार्ड देख सकता है। इन्हें देखने के बाद ही वह तय करता है कि किस कॉलेज में एडमिशन ले। जो कॉलेज खराब हैं, आज वहां बच्चे पढ़ने नहीं जा रहे। नतीजा यह है कि हर साल करीब डेढ़ सौ कॉलेज सरकार के पास आ रहे हैं कि हमें बंद करो, क्योंकि हमें छात्र नहीं मिल रहे हैं। इसलिए साफ है कि खराब गुणवत्ता वाले कॉलेजों के लिए टिके रहना मुश्किल हो गया है। निजी कॉलेजों में फीस को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है। क्या सरकार की कोई योजना है कि फीस की एक अधिकतम सीमा तय की जाए?
ऐसी योजना तो नहीं है, लेकिन आज सब कुछ निजी कॉलेजों के भरोसे नहीं है। केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्य विश्वविद्यालय के साथ-साथ अन्य सरकारी शिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ रही है। छात्रों के पास बहुत सारे विकल्प हैं। मैं फिर वही बात कहता हूं कि यदि कोई कॉलेज बहुत ज्यादा फीस वसूल रहा है, तो लोग उसके पास जाएंगे ही क्यों? अलबत्ता स्कूलों की फीस को लेकर राज्य सरकारों ने कदम उठाए हैं।
क्या सरकार विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर खोलने की अनुमति देने के लिए कोई कानून बनाएगी?
नहीं, इसके लिए पहले से नियम विद्यमान हैं। विदेशी विश्वविद्यालय भारतीय संस्थान के साथ साझीदारी में अपना परिसर खोल सकते हैं। इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियम हैं। फिलहाल यही व्यवस्था कायम रहेगी।
केंद्र सरकार के नामी विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा बन रहे हैं, सरकार क्या कदम उठा रही है?
देश में 810 विश्वविद्यालय हैं। पर 800 विश्वविद्यालयों से ऐसी कोई शिकायत नहीं है। यह समस्या सिर्फ कुछ ही विश्वविद्यालयों की है। यदि मीडिया इनमें होने वाली अटपटी बयानबाजी को ज्यादा तूल न दे, तो समस्या स्वत: खत्म हो जाएगी।
सरकार पर आरोप है कि वह छात्रों की बोलने की आजादी छीन रही है।
निराधार बात है। मैं तो उन्हें बोलने के लिए बुलाता हूं। कोई अनुरोध आता है, तो मैं छात्रों को तुरंत बुलाता हूं कि आकर अपनी बात रखो।
कॉलेजों को स्वायत्तता देने की मंत्रालय की नीति का विरोध हो रहा है, डीयू में भी विरोध दिख रहा है।
कॉलेजों को स्वायत्तता देने का मामला कोई आज शुरू नहीं हुआ है, बल्कि 1970 से चल रहा है। देश में 635 स्वायत्त कॉलेज हैं। हमने इसे आगे बढ़ाया है कि जो उच्च गुणवत्ता व रैंकिग वाले कॉलेज हैं, उन्हें स्वायत्तता दी जाए। कुछ लोग इसके पक्ष में हैं, कुछ विरोध कर रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में समस्या इसलिए भी है, क्योंकि यहां अच्छे कॉलेजों की संख्या ज्यादा है और कुछ को स्वायत्तता चाहिए, कुछ को नहीं। हम सभी की बात सुन रहे हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति कब तक आएगी?
इसे बनाने का कार्य तेजी से चल रहा है। हम जल्द ही अंतिम मसौदा तैयार कर लेंगे। दरअसल, यह बड़ा काम है, क्योंकि यह नीति 2020-2040 के लिए बन रही है। इसलिए भविष्य की तमाम जरूरतों को इसमें शामिल किया जा रहा है। समय लगना स्वभाविक है।
उच्च शिक्षा में क्या-क्या सुधार किए जा रहे हैं?
हाल में हमने यूजीसी की जगह लेने के लिए शिक्षा आयोग बनाने का फैसला किया है। मकसद है कि उच्च शिक्षा को बेहतर तरीके से विनियमित किया जा सके। इसी प्रकार, अन्य नियामकों में सुधार को लेकर भी विचार-विमर्श की प्रक्रिया चल रही है। हाल में हमने प्रतियोगी परीक्षाओं के आयोजन के लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी का गठन किया है। नीट और जेईई जैसी परीक्षाएं अब साल में दो बार होंगी। इससे छात्रों को मानसिक तनाव से छुटकारा मिलेगा। आने वाले दिनों में और भी कई नई पहल सामने आएंगी।
मेधावी छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए आपका मंत्रालय क्या कर रहा है?
हम ऐसे छात्रों के लिए स्कॉलरशिप और फेलोशिप बढ़ा रहे हैं। एनडीए सरकार जब आई थी, तो स्कॉलरशिप का बजट महज 2,000 करोड़ रुपये था, जो आज बढ़कर 5,162 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। दूसरे, हाल में आईआईटी और अन्य छात्रों के लिए प्रधानमंत्री फेलोशिप योजना शुरू की है, जिसमें हम होनहार छात्रों को शोध के लिए प्रतिमाह करीब एक लाख रुपये की राशि दे रहे हैं। यानी सालाना 12 लाख रुपये। इससे प्रतिभावान छात्रों के लिए मौके बढ़ रहे हैं।
चार साल में आपके मंत्रालय की बड़ी उलब्धियां क्या हैं?
बहुत सारी हैं। आईआईएम को स्वायत्तता देते हुए कानून बनाना बड़ी उपलब्धि है। इसी प्रकार, 20 विश्व स्तरीय संस्थान, गुणवत्ता व शोध को बढ़ाने के लिए नए कार्यक्रम शुरू करना, उच्च शिक्षण संस्थानों को आर्थिक सहायता देने के लिए हीफा जैसी वित्तीय एजेंसी की स्थापना, अटल टिंकरिंग लैब के जरिए स्कूलों में इनोवेशन को बढ़ाना, स्कूलों में ऑपरेशन डिजिटल ब्लैक बोर्ड की शुरुआत, उच्च शिक्षण संस्थानों को ग्रेडेड ऑटोनॉमी देना, बडे़ पैमाने पर ऑनलाइन कोर्स की शुरुआत, नेशनल रैंकिग फ्रेमवर्क शुरू करना, ज्ञान कार्यक्रम के जरिए विदेशी प्रोफेसरों को शिक्षण के लिए देश में आमंत्रित करना, 10 हजार कॉलेजों, विश्वविद्यालयों को वाई-फाई से जोड़ना, स्मार्ट इंडिया हैकाथन का आयोजन, छह आईआईटी में रिसर्च पार्क की स्थापना आदि। इसके अलावा शिक्षा के बजट में भारी बढ़ोतरी हुई है। जब हमारी सरकार आई थी, तब शिक्षा का बजट 67,000 करोड़ रुपये था, जो आज 1.10 लाख करोड़ रुपये के आंकडे़ को पार कर चुका है।
केंद्र सरकार की उपलब्धियां क्या रही हैं?
सबसे बड़ी उपलब्धि तो मैं देश में साढे़ सात करोड़ शौचालय बनाने को मानता हूं। यह एक सामाजिक परिवर्तन है। उत्तर प्रदेश और बिहार में महिलाओं ने शौचालयों को इज्जतघर का नाम दिया। सवा तीन लाख गांव और 17 राज्य खुले में शौच से मुक्त हुए हैं। इस प्रकार, स्वच्छ भारत अभियान एक बड़ी उपलब्धि है। फिर 3.80 करोड़ महिलाओं को एलपीजी गैस आवंटन सरकार की एक बड़ी उपलब्धि है। इससे प्रदूषण से मुक्ति मिली है और 3.80 करोड़ परिवारों का जीवन बदला है। चार करोड़ घरों में बिजली नहीं थी। 17 हजार करोड़ खर्च करके मार्च 2019 तक सभी घरों में बिजली पहुंच रही है।
लेकिन जब रोजगार की बात करते हैं, तो इसमें आपकी सरकार पिछड़ती दिख रही है।
नहीं, रोजगार बढ़े हैं। पिछले चार वर्षों में 12 करोड़ लोगों को मुद्रा लोन दिए गए हैं। कुल साढे़ छह लाख करोड़ की राशि बतौर लोन दी गई है। लोन लेने वालों में 70 फीसदी महिलाएं हैं। यह दर्शाता है कि चार साल में 12 करोड़ लोगों को रोजगार मिला, जबकि इससे पहले 50 साल में भी 12 करोड़ लोगों को लोन नहीं मिला था। रोजगार का मतलब सिर्फ नौकरी नहीं होता। स्वाभिमान से खुद की कमाई करना भी रोजगार है। किसान खेती करता है, तो वह भी रोजगार है। कोई पकौड़े बेचता है, तो वह भी रोजगार है।
आप कर्नाटक के प्रभारी रहे हैं। लेकिन वहां कांग्रेस और जेडीएस सरकार बनाने में कामयाब रहे। क्या यह आपके लिए चुनौती नहीं है?
नहीं, क्योंकि कर्नाटक का गठबंधन विचारधारा पर आधारित नहीं है। यह ज्यादा समय टिक नहीं सकता। आज वहां क्या स्थिति है, किसी से छिपा नहीं है। इसलिए ऐसे गठबंधनों से हमें चिंतित होने की जरूरत नहीं।

”हम होनहार छात्रों को शोध के लिए प्रतिमाह करीब एक लाख रुपये की राशि दे रहे हैं। यानी सालाना 12 लाख रुपये। इससे प्रतिभावान छात्रों के लिए मौके बढ़ रहे हैं।’

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