पाक में ‘किराए’ की पार्टी से चुनाव लड़ने की तैयारी में आतंकी, कई हैं हाफिज सईद के रिश्तेदार

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चुनावों के दौरान किराए की भीड़ के बारे में तो आपने सुना होगा, लेकिन पाकिस्तान के सियासी गलियारे में ‘किराए’ की पार्टी भी काफी चर्चा में है। आतंकी और कट्टरपंथी समूह संसद तक पहुंचने की कोशिश में ‘छद्म’ पार्टियों का सहारा ले रहे हैं। मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद भी अपने सियासी सपनों को पूरा करने के लिए ऐसी ही कोशिशों में जुटा हुआ है। हाफिज सईद के प्रतिबंधित संगठन जमात-उद-दावा के अंतर्गत आने वाली राजनीतिक पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग (एमएमएल) पर चुनाव आयोग ने चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी है। ऐसे में हाफिज सईद ने ‘अल्ला-हो-अकबर तहरीक’ के झंडे तले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इस पार्टी ने 25 जुलाई को होने वाले आम चुनावों में 260 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। हालांकि ये उम्मीदवार सीधे तौर पर जमात-उद-दावा के सदस्य नहीं हैं, लेकिन अधिकतर हाफिज सईद के रिश्तेदार हैं। इसी तरह ‘अहले सुन्नत वल जमात’ (एएसडब्ल्यूजे) को 2012 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। यह संगठन पहले ‘सिपाह-ई-साहबा पाकिस्तान’ (एसएसपी) के नाम से भी जाना जाता था। एसएसपी से ही जुड़े हकीम मोहम्मद इब्राहिम कासमी ने ही फरवरी, 2012 में ‘पाकिस्तान राह-ए-हक’ (पीआरएचपी) का गठन किया और अब प्रतिबंधित संगठन के प्रमुख सदस्य इसकी टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। पाकिस्तान के राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो इस बार चुनावों में राजनीतिक दलों को ही किराए पर लेने का ट्रेंड बढ़ा है। ऐसी पार्टियों का अपना कोई आधार नहीं होता और चुनावी मौसम में अचानक से ये पार्टियां नजर आने लगती हैं। चुनाव खत्म हो जाने के बाद ये फिर से गायब हो जाती हैं। ये पार्टियां खासतौर पर अपने कुछ खास लक्ष्य पूरे करने के लिए गठित की जाती हैं। इन पार्टियों का गठन बड़ी राजनीतिक पार्टियों के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए भी किया जाता है। इसके जरिए आतंकी बड़े राजनीतिक दलों से अपनी मांगे भी पूरी करवा लेते हैं। हालांकि मतदान कम होने पर इनका असर ज्यादा रहता है जबकि ज्यादा मतदान होने का फायदा प्रमुख राजनीतिक दलों को ही मिलता है। विशेषज्ञों का आशंका है कि परदे के पीछे से चल रहे इस खेल से पाकिस्तान को बड़ा नुकसान हो सकता है।

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