नीतीश-अमित शाह की बैठक सिर्फ सीटों के बंटवारे को लेकर नहीं है, ये है असली वजह

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जातिगत आधार सीमित होने के बाद भी बीते तीन दशकों से नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं. कई बार उनका राजनीतिक संतुलन बिगड़ा भी है लेकिन ज़्यादातर मौकों पर वो मुश्किलों से बाहर निकलने में कामयाब रहे हैं. लेकिन एक बार एनडीए में शामिल होने के बाद से राज्य और केन्द्र की राजनीति में उनका कद थोड़ा छोटा हो गया है.

अगले आम चुनावों से पहले जनता दल (यूनाइटेड) के खेमे में बढ़ती बेचैनी लाजमी है. कहा जा रहा है कि अगले साल पार्टी एनडीए सहयोगी के तौर पर राज्य में सम्मानजनक सीटों का कोटा चाहती है.

बिहार में कुल मिलाकर 40 सीटे हैं. इसमें से बीजेपी का राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाह के आरएसएलपी के साथ पहले ही 30 सीटों पर कब्जा है. ऐसे में जेडीयू को ज़्यादा से ज्यादा सीटे देना बीजेपी के लिए मुश्किल चुनौती है.

लेकिन क्या सीट आवंटन ही नीतीश कुमार और बीजेपी के बीच विवाद की असली वजह है? या फिर जेडीयू की चिताएं कुछ और है?

नीतीश कुमार का सपना प्रधानमंत्री बनने का रहा है लेकिन एनडीए में शामिल होते ही ये उम्मीदें लगभग खत्म होती दिख रही है. ये सपना उनका तभी पूरा हो सकता है जब एनडीए सहयोगी गठबंधन का नेतृत्व कोई गैर-बीजेपी नेता करे. लेकिन 2019 चुनाव में ऐसी संभावना न के बराबर दिख रही है.

नीतीश के लिए यहां मुद्दा आम चुनाव नहीं है. बेशक उनकी पार्टी ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है. लेकिन उनके लिए बड़ी चिंता है बिहार में 2020 का विधानसभा चुनाव. क्या वो एक बार फिर से सरकार बनाने में कामयाब होंगे? इसके अलावा बीजेपी के साथ इस चुनाव में गठबंधन की शर्तें क्या होगी?

नीतीश ने बीजेपी की बढ़ती महत्वाकांक्षा और पदचिह्न को देखा है. बीजेपी ने पहले अपने सहयोगियों के साथ एक मौखिक समझौते पर काम किया है. गठबंधन नेता के तौर पर नीतीश को राज्य में ज्यादा अहमियत दी गई है ऐसे में पार्टी को ज्यादा से ज़्यादा सीटों पर लड़ने की जरुरत है.

लेकिन अब ऐसा नहीं है. एनडीए में बीजेपी के सबसे पुराने सहयोगी शिवसेना के साथ क्या हुआ है हर किसी को पता है. यही कारण है कि जेडीयू 2020 के चुनावों के लिए बीजेपी से कुछ आश्वासन की तलाश में है. जेडीयू की मांग है कि नीतीश को बिहार में गठबंधन का चेहरा बनाया जाए.

पटना में जो लगातार बैठकों का दौर चल रहा है वो सिर्फ दिखावा नहीं है. चुनाव से नौ महीने पहले कोई भी पार्टी सीट बंटवारे पर फैसला नहीं करेगी. खास बात ये है कि नीतीश अगले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे या नहीं ये 201 9 के चुनावों के नतीजों पर निर्भर करेगा।. याद रहे राजनीति में, कोई चीज़ मुफ्त में नहीं मिलती है.

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