शिवानंद तिवारी ने किया नीतीश कुमार पर तंज, कहा- शाह के दरबार में लगाई हाजिरी

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राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने एक बार भी बिहार के मुख्यमंत्री पर नीतीश कुमार पर तंज कसा है. उन्होंने कहा कि आज पटना में नीतीश कुमार शाह की दरबार में हाजिरी लगाने पहुंच गए. गौरतलब है कि अमित शाह और नीतीश कुमार की पटना में हुई मुलाकात को लेकर शिवानंद तिवारी ने अपने फेसबुक पेज पर विशेष टिप्पणी की है. उन्होंने तंज करते हुए कहा कि अमित शाह घाघ खिलाड़ी हैं. और यह साफ है कि नीतीश कुमार द्वारा किया गया अपने बॉस का अपमान वे भूल गए होंगे यह मान लेना नादानी होगी.

तिवारी ने लिखा कि उस अपमान की थोड़ी भरपाई आज अमित शाह ने कर ही दी. पटना में अपने कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने मँजे हुए खिलाड़ी की तरह किया. सबसे पहले नीतीश कुमार से अपने दरबार में उन्होंने हाज़िरी लगवाई. भले ही उसको चाय-पानी का नाम दिया गया हो. उन्होंने आगे लिखा कि बिहार भाजपा के नेताओं को शाह के दरबार में बैठे नीतीश कुमार को देख कर आनंद आया होगा. बच्चू-अब आए औक़ात पर ! बिहार में चुनाव के दरम्यान किसका चेहरा बड़ा होगा यह अपने अंदाज में अमित शाह ने तो आज ज़ाहिर कर ही दिया. अमित शाह और नीतीश कुमार के बीच हुई मुलाकात पर शिवानंद तिवारी ने सवाल भी खड़े किए. उन्होंने कहा कि अमित शाह के दरबार में नीतीश कुमार की हाज़िरी को क्या कहा जाए ? उत्थान या पतन !

गौरतलब है कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब शिवानंद तिवारी ने सीएम नीतीश कुमार पर हमला किया हो. इससे पहले उन्होंने कहा था कि नीतीश कुमार के पास अब रास्ता नहीं है. बिहार की राजनीति में अकेले चल पाना उनके लिए मुमकिन नहीं है. अब तक के अपने राजनीतिक जीवन में दो मर्तबा अकेले चले हैं. 1995 में समता पार्टी उनके नेतृत्व में विधानसभा का चुनाव लड़ी थी. नतीजा सबको याद है. दूसरी मर्तबा 2014 का पिछला लोकसभा चुनाव वे अकेले लड़े और तीसरे स्थान पर रहे. शिवानंद तिवारी ने सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक पर एक पोस्ट में उक्त बात कही है.

तिवारी ने कहा है कि नीतीश जी भले बिहार में तीसरे नम्बर पर हैं. लेकिन आकांक्षा उनकी हमेशा पहले स्थान पर बने रहने की रही है. इसलिए वे जहां रहते हैं वहां की मुख्य ताकत से अपने को अलग दिखाकर अपनी विशिष्टता साबित करना उनकी पुरानी रणनीति रही है. लेकिन पूर्व में जब भी उन्होंने यह रणनीति अपनाई है वे अपने तत्कालीन गठबंधन से अलग हुए हैं. इसके पूर्व एनडीए से अलग होने के पहले जोरशोर से उन्होंने नरेंद्र मोदी की साम्प्रदायिक और विभाजनकारी छवि का सवाल उठाया था. इसका उन्हें अप्रत्याशित लाभ भी मिला.

देश उनको उन्हें मोदी जी के विकल्प के रूप में देखने लगा था. 2015 का विधानसभा चुनाव महागठबंधन के साथ लड़े, लेकिन सरकार बनाने के बाद जब भी मौका मिला अपने को अलग दिखाने के अंदाज पर वे कायम रहे. नोटबंदी का तत्काल समर्थन कर दिया. समर्थन के सार्वजनिक ऐलान के पहले गठबंधन के अपने सहयोगियों को अपनी अलग राय से अवगत करने का शिष्टाचार भी नहीं निभाया.

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