सुप्रीम कोर्ट का आदेश: रिटायर्ड होने पर भी भ्रष्टाचार के मुकदमे से नहीं बच सकते

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सुप्रीम कोर्ट ने जनसेवको के भ्रष्टाचार पर कड़ा रुख लेते हुए एक फैसले व्यवस्था दी है कि समय बीतने के साथ रिटायर हुए जनसेवको को उनकी आपराधिक जिम्मेदारी से छूट नहीं दी जा सकती। वह भी तब जब मामला भ्रष्टाचार विरोधी कानून के तहत किए गए अपराध का हो। यह फैसला देते हुए जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने हिमाचल प्रदेश के दो जूनियर इंजीनियरों (जेई) सजा देने वाले हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और उनकी अपीलें खारिज कर दी। जूनियर इंजीनियरों ने स्कूल के निर्माण के लिए आए सीमेंट में घपला किया था, जिससे स्कूल की इमारत नहीं बन पाई। एक जेई ने सीमेंट जारी किया था और दूसरे ने इसे प्राप्त किया था। लेकिन यह सीमेंट स्कूल नहीं पहुंच पाया और इमारत नहीं बनी। जांच में सिद्ध हो गया था कि दोनों के बीच सीमेंट का लेने देन किया गया था। इस मामले में राज्य सरकार दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी कानून, 1988 के मुताबिक धारा 13(2) के तहत मुकदमा दर्ज किया। लेकिन मामला लंबा खिंच गया, जिसके दौरान दोनों जूनियर इंजीनियर सेवानिवृत्त हो गए। निचली अदालत ने दोनों के उम्र दराज होने और पदों से सेवानिवृत्त होने के आधार पर बरी कर दिया। हिमाचल प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया और दोनों को एक-एक साल की सजा सुनाई। इस फैसले को दोनों पूर्व इंजीनियरो ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर फैसला देते हुए कहा कि रिटायर होने का अपराधिक जिम्मेदारी से कोई संबंध नहीं है। उन्हें उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार की सजा जरूर मिलनी चाहिए। अदालत ने आदेश दिया दोनों पूर्व कर्मी दो हफ्ते में निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करें और सजा भुगतें।

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