1993 में नरसिम्हा राव सरकार के खिलाफ भी आया था अविश्वास प्रस्ताव, लगा था सांसदों को धन देने का आरोप

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दिवंगत कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की सरकार के खिलाफ 1991 से 1996 के बीच तीन बार अविश्वास प्रस्ताव पेश हो चुका है। इनमें सबसे चर्चित अविश्वास प्रस्ताव का मामला जुलाई 1993 में हुआ। राव बहुत कम अंतर से अपनी सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को हरा पाए। हालांकि सरकार पर अपने पक्ष में वोटिंग करवाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के सदस्यों को धन देने का आरोप लगा था। सीबीआई ने राव और कांग्रेस नेता बूटा सिंह पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव के विरोध में वोट डालने के लिए जेएमएम के चार सांसदों, शिबू सोरेन, शैलेंद्र महतो, साइमन मरांडी और सूरज मंडल को रिश्वत दी। इस बारे में बाद में शैलेंद्र महतो सरकारी गवाह बन गए थे और उन्हीं की गवाही के आधार पर नरसिम्हा राव और बूटा सिंह को इस मामले में अभियुक्त ठहराया गया था। राव भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्हें किसी अदालत ने आपराधिक मामले का ज़िम्मेदार ठहराया था। हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने 2002 में राव और बूटा सिंह को बरी कर दिया था। बूटा सिंह बाद में बिहार के राज्यपाल भी बने। बुधवार को संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले दलों की ताकत एनडीए के संख्या बल से आधी भी नहीं है। ऐसे में यह विपक्षी एकजुटता बनाम एनडीए के बीच मुकाबला है। सदन में मतदान की नौबत आने पर यह भी साफ हो जाएगा कि कौन किधर खड़ा है और कौन दोनों पक्षों से समान दूरी पर है। एनडीए को भी अपने सहयोगी दलों को समझने का मौका मिलेगा।
क्या है अंकगणित?
सदन में मौजूदा सांसद 534
बहुमत का आंकड़ा 268
एनडीए 315
इनका रुख साफ नहीं 72
यूपीए और अन्य 147
कमजोर विपक्ष, सरकार को खतरा नहीं
अन्नाद्रमुक-37, बीजद-20, टीआरएस-11, इनेलो-02, पीडीपी-01, पप्पू यादव-01 समेत 72 सांसद ऐसे हैं जो दोनों पक्षों से बराबर दूरी बनाए हुए हैं। यह अगर विपक्ष के साथ नहीं जाते हैं तो अविश्वास प्रस्ताव के साथ खड़े कांग्रेस, तेलुगुदेशम, माकपा, भाकपा, सपा, तृणमूल कांग्रेस, राकांपा, आप, राजद समेत एक दर्जन से ज्यादा दलों के पास 147 सांसदों का ही समर्थन रह जाता है, जो एनडीए से बहुत पीछे है। ऐसे में सरकार को कोई खतरा नहीं दिखता है।

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