अविश्वास से दूर रहे दल डालेंगे राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीति पर व्यापक असर

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लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों को लेकर काफी संकेत दे दिए हैं। मिशन 2019 के मुकाबले के लिए विपक्षी खेमा नया दोस्त खोजने में असफल रहा, वहीं सरकार ने अपने खेमे को टूटने से बचाने के साथ चुनाव बाद काम आने वाले कुछ दलों को भी साधने में सफल रही है। आने वाले दिनों में क्षेत्रीय व राष्ट्रीय राजनीति में इसका व्यापक असर दिख सकता है। दरअसल संख्या बल से यह पहले से तय था कि अविश्वास को सदन का विश्वास नहीं मिलना है। ऐसे में सारी नजरे कांग्रेस व भाजपा के नेतृत्व वाले विरोधी खमों की ताकत तौलने पर लगी थी। कौन दल किधर खड़ा है, सरकार का साथ देगा या विपक्ष का। सदन में तटस्थ रहेगा या बाहर जाएगा, ऐसे कई सवाल थे, जिनके जवाब बहस से मिले हैं। भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस की विपक्षी एकजुटता की पहल रंग नहीं ला सकी। क्षेत्रीय राजनीति के तीन राज्यों तमिलनाडु, तेंलगाना व ओडिशा के सत्तारूढ़ दलों ने ने अविश्वास प्रस्ताव से दूरी बनाकर परोक्ष रूप से सरकार का साथ ही दिया।
समान दूरी वाले क्षेत्रीय दलों ने परोक्ष रूप से सरकार का साथ दिया
लोकसभा की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी अन्नाद्रमुक, पांचवी सबसे बड़ी पार्टी बीजद व सातवीं बड़ी पार्टी टीआरएस ने विपक्षी अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। बीजद तो सदन शुरू होते ही वाकआउट कर गई। उसका आरोप था कि पिछली यूपीए की दो सरकारों व मौजूदा एनडीए की सरकार ने ओडिशा के लिए कुछ नहीं किया। अन्नाद्रमुक व टीआरएस ने सदन में रहकर अपना पक्ष रखा, लेकिन तटस्थ भूमिका बनाए रखी।
शिवसेना ने नहीं दिया साथ, लेकिन एनडीए ने टूट बचाई
भाजपा को एक झटका शिवसेना से लगा, जिसने बहस में हिस्सा न लेने का फैसला किया। शिवसेना सरकार में शामिल है और अविश्वास प्रस्ताव सरकार के खिलाफ है। ऐसे में उसकी दूरी भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं है। वैसे भी शिवसेना अगला लोकसभा चुनाव भाजपा से अलग रहकर लड़ने की घोषणा कर चुकी है। भाजपा के लिए राहत इतनी ही रही कि शिवसेना न तो विपक्ष के साथ गई और न ही उसने सदन में आकर सरकार व भाजपा पर निशाना साधा।
कांग्रेस को करनी होगी और मेहनत
अविश्वास प्रस्ताव की लड़ाई में साफ हो गया कि लोकसभा चुनावों के लिए एनडीए से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस और उसके साथ खड़े दलों को अभी और मेहनत करनी होगी। कांग्रेस को किसी नए दल का समर्थन नहीं मिला, वहीं भाजपा गैर एनडीए व गैर यूपीए प्रमुख दलों को सरकार के खिलाफ जाने से रोकने में सफल रही। इसके जरिये भाजपा व इन दलों ने अगले साल होने वाले लोकसभा व उसके बाद की स्थिति के लिए विकल्प खुले रखे हैं। फिलहाल यह स्थिति भाजपा व इन दलों दोनों के लिए सबसे बेहतर है।

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