भारत को निशाना’ बनाने वाले सीनियर हक़्क़ानी की मौत

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वाशिंगटन: दुनिया भर की सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहे आतंकवादी जलालुद्दीन हक्कानी की मौत हो गई है. अफगानिस्तान को अशांत रखने में अहम रोल निभाने वाले जलालुद्दीन के मौत की पुष्टि हो गई है. अफगान तालिबान ने अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादी गुटों में से एक हक्कानी नेटवर्क के नेता जलालुद्दीन हक्कानी की मौत की घोषणा की है. निगरानी समूह एसआईटीई ने अफगान तालिबान के बयान के हवाले से बताया, ‘उसने अल्लाह के धर्म के लिए बहुत कठिनाइयों का सामना किया. साथ ही उसने अपने जीवन के आखिरी वर्षों के दौरान लंबी बीमारी का भी सामना किया.’ जलालुद्दीन हक्कानी की मौत के बाद उसके बेटे सिराजुद्दीन को नेटवर्क संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

माना जाता है कि जलालुद्दीन हक्कानी का दिमाग काफी शार्प था. शायद इसलिए वह सोवियत संघ (विघटन के बाद रूस) जैसे संपन्न देश के खिलाफ लंबे समय तक टकराता रहा. हक्कानी नेटवर्क का गठन जलालुद्दीन हक्कानी ने किया था जिसने अफगानिस्तान में 1980 के दशक में सोवियत फौजों से जंग लड़ी थी. उस समय मुजाहिदीन को अमेरिका का समर्थन हासिल था. 1995 में हक्कानी नेटवर्क तालिबान के साथ मिल गया और दोनों गुटों ने अफगान राजधानी काबुल पर 1996 में कब्जा कर लिया. 2012 में अमेरिका ने इस गुट को आतंकवादी संगठन घोषित किया.

जलालुद्दीन हक्कानी का जन्म 1939 में अफगानिस्तान के पकतिया प्रांत में हुआ था. उसने दारुल उलूम हक्कानिया से पढ़ाई की थी. इसे पाकिस्तान के बड़े धार्मिक नेता मौलाना समी उल हक के पिता ने 1947 में शुरू किया था. दारुल उलूम हक्कानिया तालिबान और दूसरे चरमपंथी गुटों के साथ अपने संबंधों के लिए जाना जाता है.

तालिबान के शासन में जलालुद्दीन हक्कानी को अफगान कबायली मामलों का मंत्री बनाया गया. 2001 में अमेरिका के हमलों के बाद तालिबान का शासन खत्म होने तक वह इस पद पर था. तालिबान नेता मुल्ला उमर के बाद जलालुद्दीन को अफगानिस्तान में सबसे प्रभावशाली चरमपंथी माना जाता था. जलालुद्दीन के अल कायदा के नेता ओसामा बिन लादेन से भी गहरे संबंध थे.

रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि इस गुट का कमांड सेंटर अफगान सीमा से लगते पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान के मीरनशाह शहर में है. अमेरिकी और अफगान अधिकारियों का दावा है कि हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान की सेना का समर्थन है हालांकि पाकिस्तानी अधिकारी इससे इनकार करते हैं. अमेरिका का कहना है कि इस गुट के लड़ाकों ने अफगानिस्तान में विदेशी सेना, स्थानीय फौज और नागरिकों पर हमले किये हैं.

जानकार मानते हैं कि जलालुद्दीन हक्कानी की मौत से अफगानिस्तान में काफी हद तक शांति लौटने की उम्मीद है. माना जाता है कि जलालुद्दीन भले ही लंबे समय से बिस्तर पर था, लेकिन वह अपने दिमाग और अनुभवों से नेटवर्क के लिए काफी मददगार बना हुआ था.

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