सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद सोशल मीडिया को हायर नहीं कर पाएगा

0
103

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही धारा 377 को खत्म करने का फैसला किया, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने एक बयान जारी कर इस मुद्दे पर अपना रुख साफ कर दिया. RSS ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तरह वो भी समलैंगिकता को अपराध नहीं मानती है, लेकिन ऐसे संबंध को वह प्रकृति के खिलाफ मानती है, लिहाजा वो समलैंगिक शादियों का समर्थन नहीं करते हैं.

RSS के प्रमुख अरुण कुमार ने एक बयान में कहा, ‘‘सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तरह हम भी इसे (समलैंगिकता) अपराध नहीं मानते. ये संबंध प्राकृतिक नहीं होते इसलिए हम इस तरह के संबंध का समर्थन नहीं करते हैं.’’

समलैंगिकता को लेकर RSS का ये बयान काफी नपा तुला रहा. RSS ने इस मुद्दे पर अपनी साफ-साफ राय रख दी है, जबकि दूसरी तरफ बीजेपी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. समलैंगिकता के मुद्दे पर संघ ने दो साल पहले के अपने विचार को दोहराया है.

समलैंगिकता को लेकर RSS ने अपने रुख में नरमी साल 2016 में ही दिखाई थी. उस वक्त संगठन के तत्कालीन संयुक्त सचिव दत्तात्रेय होसबोले थे, जिन्हें बाद में महासचिव बना दिया गया.

मार्च 2016 में जयपुर में एक कार्यक्रम में भाग लेने के दौरान होसाबले ने घोषणा की थी कि समलैंगिकता को लेकर RSS का दृष्टिकोण अपराधीकरण वाला नहीं होना चाहिए और साथ ही वो इसका महिमामंडन भी नहीं करेंगें.

उन्होंने कहा, “समलैंगिकता को तब तक अपराध नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि ये समाज में दूसरों के जीवन को प्रभावित न करे … हम, आरएसएस में, व्यक्तिगत प्राथमिकताओं पर कभी चर्चा नहीं करते हैं”.

दत्तात्रेय होसबोले के इस बयान के बाद RSS में खलबली मच गई थी. RSS को इस मुद्दे पर अपना रुख साफ करने को कहा गया. होसबोले ने अगले दिन ट्विटर पर इस मुद्दे पर सफाई दी. उन्होंने लिखा, ”समलैंगिकता मनोवैज्ञानिक का मामला है, जिसे अपराध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. लेकिन समलैंगिक विवाह को बंद किया जाना चाहिए.”

इसी के तहत संघ ने एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अपनी बात दोहराई. संगठन पर अपनी किताब, ‘आरएसएस: ए व्यू टू द इनसाइड’ के लेखक श्रीधर दामले और वॉल्टर एंडरसन ने भी संघ के बदलते दृष्टिकोण के बारे में विस्तार से बात की है. जहां उन्होंने समलैंगिकता और खान-पान के मुद्दों पर लिखा है.

किताब में एक जगह लिखा गया है, “भारत में तेजी से आर्थिक विकास के साथ-साथ पारंपरिक सामाजिक मूल्यों में भी बदलाव आ रहा है. हमारे कुछ वरिष्ठ नेताओं ने समलैंगिकता पर अपने तटस्थ विचार रखा है”

साल 2009 में जब दिल्ली हाईकोर्ट ने धारा 377 को हटाया था उस वक्त बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था, “हम धारा 377 का समर्थन करते हैं, क्योंकि हम मानते हैं कि समलैंगिकता अप्राकृतिक चीज़ है.”

साल 2014 में जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता पर हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया था उस वक्त धारा 377 पर ऑर्गनाइज़र में लेख छपा था. इसमें लिखा था, “यूपीए सरकार की रिव्यू पेटिशन को खारिज सुप्रीम कोर्ट का एक साहसिक फैसला है. देश के मूल्यों को संरक्षित करने में एक मील का पत्थर है.”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here