लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र महत्वपूर्ण राज्य

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नई दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए आगामी लोकसभा चुनाव में सत्ता में लौटने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं हालांकि यह पार्टी के सहयोगियों व उसके प्रतिद्वंद्वियों पर भी निर्भर करता है। 2014 चुनाव में भगवा दल ने इन राज्यों में खासा अच्छा प्रदर्शन किया था। गैर भाजपा दल जहां कुछ राज्यों में ‘महागठबंधन’ बनाने की तैयारी में जुटे हैं वहीं सत्तारूढ़ भाजपा को अपने प्रदर्शन, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपीलों के आधार पर लगातार दूसरी बार सत्ता पाने की उम्मीद है।

लोकसभा में सबसे बड़ी संख्या में सांसद भेजने वाला राज्य उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए एक मुख्य लड़ाई साबित होगा, जहां उसे अग्नि-परीक्षा का सामना करना होगा। राज्य में 80 लोकसभा सीटे हैं।

समाजवादी पार्टी (सपा) व बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने कांग्रेस को बाहर रखते हुए गठबंधन किया है, वहीं कांग्रेस अकेले उतरने की तैयारी कर रही है। ऐसे में राज्य में बहुकोणीय जंग होती दिखाई दे रही है। राजनीतिक पंडितों को लगता है कि सपा-बसपा गठबंधन भाजपा के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है और 2019 में उसकी सत्ता वापसी में बाधा पैदा कर सकता है।

राष्ट्रीय राजनीति के सबसे बड़े घटनाक्रम के रूप में सपा-बसपा का साथ आना भाजपा को एक तगड़ा झटका दे सकता है क्योंकि पार्टी को पहले इनके अलग होने से फायदा हुआ था। दोनों ने पिछले साल साथ आकर गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा उपचुनाव में सफलता का स्वाद चखा था। सपा ने जहां दो सीटें जीतीं वहीं रालोद ने सपा-बसपा के समर्थन से कैराना पर अपना परचम लहराया था।

2014 लोकसभा चुनाव की जंग में भाजपा ने अपने दम पर 71 सीटें जीती थीं और दो सीटों पर उसकी सहयोगी ने जीत हासिल की थी, यह अब तक का पार्टी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। कांग्रेस और सपा अपनी कुछ मुख्य सीटों को बचाने में सफल रही थीं लेकिन बसपा का सूपड़ा साफ हो गया था।

भाजपा नेता व्यक्तिगत तौर भी स्वीकार कर रहे हैं कि सपा-बसपा गठबंधन पार्टी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा हो सकता है। हालांकि पार्टी के प्रमुख अमित शाह का कहना है कि चुनाव में अंकगणित नहीं बल्कि केमिस्ट्री काम आती है।

बात करें बिहार की तो राज्य में उभरे नए राजनीतिक समीकरणों से बिहार का रणक्षेत्र उत्तर प्रदेश की तरह दिलचस्प हो गया है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नीत विपक्ष ने कांग्रेस और पूर्व केंद्रीय मंत्री की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) व पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा जैसे अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर राजग से टक्कर लेने के लिए ‘महागठबंधन’ बनाया है। राजग में जनता दल-युनाइटेड (जेडी-यू), भाजपा और रामविलास पासवान की लोजपा है।

पिछले लोकसभा चुनाव में राजग का हिस्सा रहे कुशवाहा ने पिछले साल अपने रास्ते अलग कर लिए। 2014 में भाजपा ने 22, लोजपा ने छह और रालोसपा ने तीन सीटें जीती थीं, जबकि जेडी-यू ने अकेले चुनाव लड़ा था और उसे केवल दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। वहीं राजद ने चार और कांग्रेस ने दो सीटें जीती थीं।

भाजपा, जेडी-यू और लोजपा ने इस बार पहले ही सीट बंटवारा कर लिया है। इस चुनाव में भाजपा और जेडी-यू 17-17 सीटों पर जबकि लोजपा छह सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

2019 में जाति-समीकरण राजग और महागठबंधन दोनों के लिए महत्वपूर्ण होते दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ जहां उच्च जातियां और पिछड़ा वर्ग कुर्मी व कोइरी समुदाय राजग को समर्थन दे सकता है वहीं यादव, अल्पसंख्यक, दलित और महादलित उसके प्रतिद्वंद्वियों के खेमे में जा सकते हैं। 24 प्रतिशत आबादी वाले अत्यधिक पिछड़ा वर्ग के भी अहम भूमिका निभाने की उम्मीद है।

बात करें एक और बड़े राज्य महाराष्ट्र की तो विपक्षी दलों के बीच गठबंधन भाजपा की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।

मूल हिंदूवादी संगठन भाजपा और शिवसेना के बीच दरार इस वक्त चरम पर है और मतभेदों को सुलझाने के प्रयास जारी हैं। अगर दोनों दल साथ आते हैं तो उनके पास कांग्रेस-राकांपा गठबंधन से पार पाने का एक विकट कार्य है। राजनीतिक समीक्षकों को लगता है कि अगर भाजपा व शिवसेना अकेले-अकेले लड़ती हैं तो दक्षिणपंथी वोट बंटेंगे और दोनों पार्टियों को नुकसान पहुंचेगा।

भाजपा ने 2014 में महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से 24 और शिवसेना ने 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। चुनाव में मोदी लहर के चलते भाजपा ने 23 और शिवसेना ने 18 सीटें जीती थीं।

मतभेदों को समाप्त करने के मकसद से गुरुवार को शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बीच एक बैठक हुई थी।

इसके अलावा राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के नेता राज ठाकरे से मुलाकात की थी, जिसके बाद से मनसे के महागठबंधन में शामिल होने की चर्चा जोरों पर है। हालांकि, कांग्रेस इसके पक्ष में दिख नहीं रही है।

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