मौद्रिक अर्थशास्त्र पर फिर से गौर करने की जरूरतः शक्तिकांत दास

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    वाशिंगटन : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा है कि उभरते बाजारों में मौद्रिक अर्थशास्त्र पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है. उनका कहना है कि वैश्विक ऋण संकट ने पारंपरिक और गैर-पारंपरिक मौद्रिक नीतियों की कमी को उजागर कर दिया है. इसलिए खासकर उभरते विकासशील देशों के संदर्भ में इस पर पुनर्विचार की जरूरत है.

    परंपरागत सोच में भी बदलाव की जरूरत
    दास ने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्वबैंक की सालाना समर मीटिंग से अलग कहा कि इसमें आधुनिक केंद्रीय बैंकों की नीतिगत दर (रेपो) 0.25 प्रतिशत घटाने या बढ़ाने को लेकर परंपरागत सोच में भी बदलाव की जरूरत है. गवर्नर ने 21वीं सदी में मौद्रिक नीति से जुड़ी चिंताओं के निपटारे के लिए लीक से हटकर सोचने का आह्वान किया. कार्यक्रम में उपस्थित श्रोताओं ने इसकी जमकर सराहना की.

    उभरते बाजारों के लिए ‘जोखिम’ की स्थिति
    उन्होंने कहा कि विकसित देशों की गैर-परंपरागत मौद्रिक नीति का दूसरे देशों पर प्रतिकूल असर पड़ा है और उभरते हुए बाजारों के लिए ‘जोखिम’ की स्थिति पैदा हो गई है और वे भी प्रभावित हो रहे हैं. दास ने कहा कि वैश्विक वित्तीय संकट की वजह से परंपरागत और अपरंपरागत मौद्रिक नीति के सिद्धांतों की कमी सबके सामने आ गयी है.

     

    उन्होंने कहा कुछ देश निराशा में नये तरीकों पर विचार कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल आधुनिक मौद्रिक नीति के तौर पर किया जा रहा है. दास के अनुसार अंततः मौद्रिक नीति का लक्ष्य वास्तविक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करना, निवेश को बढ़ावा देना और मौद्रिक एवं वित्तीय स्थिरता प्रदान करना है.

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