UN रिपोर्ट में पाकिस्तान के मिलिटरी कोर्ट पर गंभीर सवाल

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इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में भारत ने अपने नागरिक कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान की एक सैन्य अदालत द्वारा मौत की सजा देने के फैसले को चुनौती दी है। इस बीच संयुक्त राष्ट्र की एक अहम समिति ने अपनी रिपोर्ट में पाकिस्तान की सैन्य अदालतों के काम-काज पर चिंता व्यक्त की है। समिति ने मिलिटरी कोर्ट की आलोचना करते हुए कहा है कि जाधव जैसे मामलों की सुनवाई सिविल कोर्ट में होनी चाहिए। समिति ने कहा है कि मिलिटरी कोर्ट सेना का हिस्सा होने की वजह से आजाद नहीं है लिहाजा सिविलियन से जुड़े मामले सिविल कोर्ट में चलाए जाए। ‘यूएन कमिटी अगेंस्ट टॉर्चर’ की पिछले हफ्ते प्रकाशित रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जाहिर की गई है कि पाकिस्तान सरकार ने मिलिटरी कोर्ट आतंकवाद से जुड़े अपराधों के मामले में सिविलियंस के ट्रायल का अधिकार दिया है। कमिटी ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि सेना को अधिकार मिला हुआ है कि वह बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के संदिग्ध व्यक्तियों को हिरासत में ले सकती है। संयोग से, पाकिस्तान की मिलिटरी कोर्ट ने भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को जासूसी के आरोप में बिना किसी सबूत के सजा सुनाया है। जाधव तक भारत को राजनयिक पहुंच भी नहीं दी गई। भारत का कहना है कि जाधव को पाकिस्तानी एजेंसियों ने ईरान से अगवा किया था। संयुक्त राष्ट्र की समिति ने पाकिस्तान से मांग की है कि वह आतंकवाद से जुड़े मामलों में सिविलियंस के खिलाफ मिलिटरी कोर्ट में चल रहे मुकदमों को सिविलियन कोर्ट में ट्रांसफर करे। समिति ने कहा है कि पाकिस्तान के आतंकरोधी कानून, खासकर ऐंटी-टेररिजम ऐक्ट 1997 में यातनाओं से रक्षा के कानूनी उपायों को ‘खत्म’ कर दिया गया है। समिति ने कहा है कि मजिस्ट्रेट की गैरमौजूदगी में लिए गए इकबालिया बयानों को साक्ष्य के रूप में न माना जाए, यह पाकिस्तान सुनिश्चित करे। खास बात यह है कि पाकिस्तान ने दावा किया है कि जाधव ने अपना जुर्म कबूल किया है।

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