मकान का बीमा नहीं दिया तो लगा जुर्माना

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मकान के रिस्क कवर का बीमा होने के बावजूद क्लेम न देना श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी को भारी पड़ गया। वर्ष 2015 में भूकम्प आने पर पीडि़त का मकान क्षतिग्रस्त हो गया था। कपंनी ने क्लेम देने से इनकार किया तो पीडि़त ने कंज्यूमर फोरम में वाद दायर कर दिया। जिस पर सुनवाई करते हुए फोरम ने बीमा कम्पनी को आदेश दिया है कि वह एक माह के अंदर पीडि़त को 8.5 लाख रुपए भुगतान कर दे। अन्यथा उसे 9 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज का भी भुगतान करना पड़ेगा.

देना पड़ा वाद खर्च भी

सुभाषनगर के चौपुला ओवर ब्रिज के नीचे रहने वाले नरेश कुमार सिंह ने 16 मई 2014 से 15 मई 2015 के लिए मकान का रिस्क कवर बीमा श्रीराम जनरल इंश्योरेंश कम्पनी से कराया था। बीमा करते समय कर्मचारी क्षितिज कुमार ने पालिसी धारक नरेश कुमार को बताया कि उनके मकान में चोरी, भूकंप, आकाशीय बिजली और मकान क्रेक होने पर उन्हें रिस्क कवर मिलेगा। उसी समय 24 अप्रैल 2015 को आए भूकंप के दौरान नरेश के मकान का लिंटर क्रेक हो गया और दीवारों में दरारे आ गई, जिससे मकान भी एक तरफ को झुक गया। नरेश ने इसकी सूचना 25 अप्रैल 2015 को इंश्योरेंश कंपनी को टोल फ्री नम्बर पर दी, जिसके बाद पालिसी धारक को कम्पनी ने एक क्लेम नम्बर भी दिया। जिसके बाद बीमा कम्पनी से 7 मई 2015 को कर्मचारी भेजकर मकान की फोटो कराई गई और बताया गया कि एक दो दिन में क्लेम फार्म भर देना, जिसके बाद क्लेम मिल जाएगा, लेकिन कम्पनी ने कोई क्लेम नहीं दिया। जब पालिसी धारक ने बीमा कम्पनी को कॉल की तो बताया गया कि मकान तोड़कर बनवा लो भुगतान कर दिया जाएगा, लेकिन पालिसी धारक ने 9 जून 2015 को मकान बनवा लिया लेकिन भुगतान नहीं दिया गया, जिसके बाद पीडि़त नरेश ने कंज्यूमर फोरम में एक वाद दायर कर दिया। मामले में जब बीमा कम्पनी को पक्ष रखने के लिए बुलाया गया तो उसने बताया कि मकान अत्यंत पुराना था और भूकंप की इतनी तीव्रता नहीं थी कि मकान क्रेक हो जाए इसीलिए पालिसी का रिस्क कवर भुगतान योग्य नहीं है। साथ मकान में दुकानें बनवाकर व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा था। मामले में सुनवाई करते हुए फोरम प्रथम के अध्यक्ष बृजेश चन्द्र सक्सेना ने पाया कि पालिसी में प्राकृतिक आपदा से होने वाली क्षति का भी भुगतान पालिसी की शर्तो में शामिल था। जिस पर अध्यक्ष ने श्रीराम जनरल इंश्योरेंश पर 8 लाख मकान की क्षतिपूर्ति और 50 हजार का वाद व्यय के रूप में पीडि़त को भुगतान करने का आदेश दिया.

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