अर्थव्यवस्था को रफ्तार, विकास को धार, खजाने पर भार

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अर्थव्यवस्था में नरमी को दूर करने और विकास को धार देने के लिए नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार सार्वजनिक खर्च को बढ़ाने पर विचार कर सकती है। भले ही इसकी वजह से राजकोषीय घाटे पर प्रतिकूल असर पड़े। माना जा रहा है सरकार के शीर्ष नीति निर्माताओं ने विभिन्न बैठकों में इस तरह के अन्य विकल्पों पर विस्तार से चर्चा की है।

विकास को बढ़ावा देने के उपाय तलाशने के लिए मंत्रियों और अफसरों ने कई बैठकें की हैं, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष जल्द ही पेश किया जाएगा। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली, वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु, रेलवे एवं कोयला मंत्री पीयूष गोयल, नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार तथा वित्त, वाणिज्य एवं रेल मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच इस हफ्ते हुई बैठकों में कई विकल्पों पर विचार-विमर्श किया गया था।

बिज़नेस स्टैंडर्ड का मानना है कि इन बैठकों में पूंजीगत व्यय को 2017-18 के लिए तय 3.10 लाख करोड़ रुपये की सीमा आगे ले जाने के लिए संसाधन जुटाने के उपाय भी शामिल हैं। इसके तहत अधिक कर्ज भी लिया जा सकता है और विनिवेश के तहत अधिक रकम भी जुटाई जा सकती है। अधिकारियों का कहना है कि अभी इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के लागू होने के पहले साल में अप्रत्यक्ष कर राजस्व में कमी आने के संकेत मिल रहे हैं।

अधिक व्यय के लिए राजस्व कहां से आएगा, यह स्वाभाविक प्रश्न है। लेकिन शीर्ष नीति निर्माताओं का कहना है कि इसके लिए विनिवेश की योजना पर विचार किया जा सकता है। मसलन एयर इंडिया का विनिवेश इसी साल पूरा हो सकता है या नहीं। केंद्र सरकार बाजार से अधिक उधार भी ले सकती है। वित्त वर्ष 2017-18 में बजटीय सकल उधारी 5.8 लाख करोड़ रुपये तय की गई थी और कुल विनिवेश लक्ष्य 72,500 करोड़ रुपये का है। अलबत्ता केंद्र ने शुरुआती संकेत दिया था कि एयर इंडिया का निजीकरण लंबी प्रक्रिया है और यह इस साल पूरी नहीं की जा सकती है।

सूत्रों ने कहा कि गैर-वित्तीय प्रोत्साहन के उपायों पर भी चर्चा की गई, जिनमें केंद्रीय एजेंसियों जैसे कि एनएचएआई के इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड जारी करना आदि शामिल है। एक अधिकारी ने कहा, ‘बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के विभिन्न विकल्पों पर भी चर्चा की गई। इसके लिए ऋण बाजार से पैसे जुटाए जा सकते हैं या केंद्र बैंकों में हिस्सेदारी बेचकर ऐसा कर सकता है। कुछ सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण तक पर चर्चा की गई।’

एक अन्य अधिकारी ने भी बैठकों में इस बात पर विचार किए जाने की पुष्टिï की कि पूंजीगत व्यय को बजट के दायरे में ही रखा जाए या राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को दरकिनार किया जाए। हालांकि केंद्र अब तक राजकोषीय घाटे को लक्ष्य के भीतर ही रखने पर जोर देता रहा है। लेकिन विश्लेषकों और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सरकार को व्यय बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि निजी निवेश नरम बना हुआ है। मामले से जुड़े एक शख्स ने बताया, ‘इस बारे में अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री द्वारा जल्द ही लिया जाएगा। हम ऐसे निर्णय के लिए साल की दूसरी छमाही तक का इंतजार नहीं कर सकते।’

यह मानते हुए कि वर्ष 2017-18 के लिए कुल राजस्व के आंकड़े नहीं बदलते हैं तो प्रत्येक 1,000 करोड़ रुपये के खर्च पर राजकोषीय घाटा जीडीपी के 0.1 फीसदी से भी कम दर से बढ़ेगा। इस तरह पूंजीगत व्यय में 40,000 करोड़ रुपये बढ़ोतरी से राजकोषीय घाटा बजट लक्ष्य के 3.2 फीसदी के मुकाबले बढ़कर 3.5 फीसदी हो सकता है।

चालू वित्त वर्ष के लिए केंद्र सरकार ने बजट में रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय करने की बात कही है। यह 2016-17 के मुकाबले 25 प्रतिशत अधिक और संशोधित अनुमान 2.80 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 11 प्रतिशत अधिक है। हालांकि अब तक के उपलब्ध राजकोषीय घाटे के आंकड़े बताते हैं कि व्यय और राजस्व में अतर 5.05 लाख करोड़ रुपये है, जो पूरे वित्त वर्ष के 5.46 लाख करोड़ रुपये का करीब 92 प्रतिशत है। नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद कंपनियों द्वारा अपने स्टॉक खाली करने और नया स्टॉक फिलहाल नहीं बनाने से अप्रैल-जून तिमाही में आर्थिक विकास दर कम होकर 5.7 प्रतिशत रह गई। नतीजा यह हुआ कि भारत लगातार दूसरी तिमाही में जीडीपी में तेजी के लिहाज से पिछड़ गया। दोनों तिमाही में चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रही। वित्त वर्ष 2016-17 की अप्रैल-जून तिमाही में 7.9 प्रतिशत के मुकाबले जीडीपी विकास दर कम है।

अप्रैल-जून में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर भी कम होकर 1.2 प्रतिशत रह गई, जो जनवरी-मार्च में 5.3 प्रतिशत थी। खनन और संबंधित गतिविधियों में भी आलोच्य अवधि के दौरान 0.7 प्रतिशत की कमी आई। कृषि विकास दर पिछले तिमाही की 5.2 प्रतिशत और अक्टूबर-दिसंबर 2016-17 की 6.9 प्रतिशत के मुकाबले कम होकर 2.3 प्रतिशत रह गई।

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