नए कॉन्सेप्ट, जोरदार इरफान और कमजोर क्लाइमेक्स का कॉकटेल है ‘करीब करीब सिंगल’

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अच्छी-खासी कहानी को पलीता लगाना कोई बॉलीवुड से सीखे. इस हुनर में बॉलीवुड का कोई सानी नहीं है. ऐसा ही कुछ ‘करीब करीब सिंगल’ में भी किया गया है. फिल्म ऑनलाइन डेटिंग और अधेड़ उमर के प्रेम के इंट्रेस्टिंग कॉन्सेप्ट पर बेस्ड है. इरफान खान और साउथ की पार्वती जैसे सधे हुए कलाकार हैं. पहले हाफ में जबरदस्त बिल्डअप भी है, लेकिन सेकंड हाफ में आकर ऐसा लगता है कि फिल्म की कोई कहानी रह ही नहीं गई है. डायरेक्टर समझ नहीं पा रही हैं कि उन्होंने जो रायता फैलाया है उसे कैसे समेटें. सीन काफी खींचे हुए लगते हैं, पार्वती की एक्टिंग भी बिखर कर रह जाती है, और कुछ भी एक्साइटिंग नहीं बचता है.

फिल्म की कहानी इरफान और पार्वती की है. पार्वती के पति का निधन हो चुका है और वह अकेले जिंदगी जी रही है. लोग अपने काम निकालने के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं. लेकिन एक दिन वो हिम्मत करके डेटिंग साइट पर जाती है, और वहां उसे मिलता है जिंदादिल और मस्तमौला इरफान खान. उसका बिंदास अंदाज और जिंदगी को लेकर नो टेंशन एटीट्यूड पार्वती को जम जाता है. फिर एक दिन इरफान डींगें हांकते हुए कहता है कि उसकी पूर्व तीन गर्लफ्रेंड उसके लिए आज भी रोती होंगी जबकि पार्वती कहती हैं कि ये बकवास है. इस तरह इरफान की पुरानी गर्लफ्रेंड्स का हाल जानने के लिए वे देहरादून, जयपुर और गंगटोक जाते हैं. इस सफर के दौरान काफी कुछ होता है पार्वती और इरफान के बीच की कैमिस्ट्री सामने आती है.

पहला हाफ मस्त चलता है, इरफान खान की एक्टिंग पानी की तरह बहती है और वह कहानी में जान डालते हैं. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस बहुत मजबूत है. लेकिन ऐसा लगता है कि डायरेक्टर और राइटर के पास फिल्म को लेकर अच्छा कॉन्सेप्ट तो था लेकिन कहानी नहीं थी. इरफान की तीन गर्लफ्रेंड्स का जिक्र और भी कई ऐसी बातें हैं जिनके कोई मायने नजर नहीं आते हैं. दूसरा हाफ थका देता है और पहले हाफ के मजे को भी बिगाड़ देता है. फिल्म में कई सवालों के जवाब नहीं मिल पाते हैं.

इरफान खान बेहतरीन एक्टर हैं, इसमें कोई शुबहा नहीं है. उन्होंने योगी का किरदार इतने बेहतरीन ढंग से निभाया है कि इससे अच्छे ढंग से कोई भी नहीं कर सकता था. योगी का बिंदास अदांज, किलिंग एटीट्यूड, देसीपन और जिंदादिली दिल में उतर जाती है. मन करता है, योगी स्क्रीन से जाए ही नहीं. शायद यही वजह है कि योगी पार्वती के दिल में भी उतर जाता है. योगी की शायरी तो कमाल की है. इरफान इतनी आसानी से योगी के किरदार को निभाते हैं, यह अपने आप में कमाल की चीज है. मलयालम फिल्मों में नजर आ चुकीं पार्वती ने भी अच्छी एक्टिंग की है. उन्होंने इरफान का अच्छा साथ दिया है. नींद वाले सीन में वे थोड़ी अजीब लगती हैं. नेहा धूपिया छोटे से रोल में आती हैं. लेकिन उनके पास करने को कुछ ज्यादा नहीं है.

फिल्म का कॉन्सेप्ट सिंगल वर्किंग वीमेन और अधेड़ शायर पर आधारित है. ऑनलाइन डेटिंग भी है. रोड मूवी का कॉन्सेप्ट भी है. खूबसूरत नजारे भी हैं. लेकिन सेकंड हाफ में कहानी हांफ जाती हैं. मजबूत फर्स्ट हाफ और कमजोर सेकंड हाफ तंग करता है. फिल्म का बजट लगभग 20 करोड़ रु. बताया जाता है. फिल्म में न्यू जनरेशन को कनेक्ट करने वाले कई फैक्टर हैं. फिर इरफान की एक्टिंग के दीवानों और उनके फैन्स के लिए यह अच्छी ट्रीट है. इसके अलावा कोई और बड़ी उम्मीद पालना ‘करीब करीब नासमझी’ होगी

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