जजों के ‘रिश्वत केस’ में ये हैं तीन अहम किरदार

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देश की सर्वोच्च अदालत से ज्यादा शायद ही कोई संस्था हो जिस पर इस देश को नागरिकों को सच्ची श्रद्धा और अटूट विश्वास हो. लेकिन सच्चाई यह भी है कि देश की यह शीर्ष मर्यादित संस्था भी भ्रष्टाचार की कालिख से अछूती नहीं है. अमूमन SC के आदेशों और फैसलों को सिर माथे पर रखने वाले लोगों के लिए शुक्रवार को दिन तब हैरान कर देने वाला रहा, जब सुप्रीम कोर्ट में अदालतों में व्याप्त भ्रष्टाचार के एक मामले की सुनवाई के दौरान हाई वोल्टेज ड्राम देखने को मिला.

जजों को रिश्वत देने के एक मामले में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस जे चेलामेश्वर और तीन नामी-गिरामी वकीलों प्रशांत भूषण, दुष्यंत दवे और कामिनी जायसवाल के बीच सुप्रीम कोर्ट में किस कदर तीखी नोंकझोंक हुई, पूरे देश ने देखा. कोर्टरूम से ही लोगों ने ट्वीट किए, प्रशांत भूषण साफ तौर पर नाराजगी जाहिर करते हुए कोर्टरूम छोड़कर चले गए और चीफ जस्टिस मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने जस्टिस चेलामेश्वर द्वारा जारी आदेश को रद्द कर दिया.

दीपक मिश्रा इसी साल 28 अगस्त को चीफ जस्टिस बने. चीफ जस्टिस (रिटायर्ड) जेएस खेहर की जगह लेने वाले दीपक मिश्रा 2 अक्टूबर, 2018 तक देश के शीर्ष न्यायाधीश बने रहेंगे. सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त होने से पहले दीपक मिश्रा मध्य प्रदेश और ओडिशा हाई कोर्ट्स में जज रह चुके हैं.

दीपक मिश्रा कई ऐसे फैसलों से संबद्ध रहे हैं, जिसने देश में एक नई हलचल पैदा की. निर्भया गैंगरेप के दोषियों को मौत की सजा सुनाने वाली sc की पीठ में दीपक मिश्रा भी शामिल थे. सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाए जाने के दीपक मिश्रा के आदेश ने पूरे देश में राष्ट्रवाद की बहस को बेहद तीखा कर दिया था.

चीफ जस्टिस होने के नाते किस मामले की सुनवाई किस पीठ की दी जाए, इसका अंतिम फैसला करने का अधिकार दीपक मिश्रा के पास ही है और किसी मामले की सुनवाई के लिए संविधान पीठ गठित करने की जरूरत है या नहीं, इसका भी फैसला करने का अधिकार उन्हीं के पास है. इसी अधिकार का उपयोग करते हुए चीफ जस्टिस मिश्रा ने जजों द्वारा रिश्वत लेने के मामले की सुनवाई के लिए 5 जजों की संविधान पीठ गठित करने के जस्टिस चेलामेश्वर के आदेश की रद्द कर दिया. उनके इसी आदेश को लेकर यह सारा ड्रामा खड़ा हुआ.

केरल और गुवाहाटी हाई कोर्ट्स के चीफ जस्टिस रहे जे. चेलामेश्वर इस समय देश की सर्वोच्च अदालत में दूसरे सबसे वरिष्ठ जज हैं. जस्टिस चेलामेश्वर को अक्सर हायर जुडिशरी में जजों की नियुक्ति करने वाली मौजूदा कॉलेजिम सिस्टम की आलोचना करने के लिए भी जाना जाता है.

जस्टिस चेलामेश्वर 2011 से सुप्रीम कोर्ट में जज हैं और चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से पहले ही रिटायर होने वाले हैं. इसका मतलब यह है कि दूसरे सबसे वरिष्ठ जज होने के बावजूद जस्टिस चेलामेश्वर चीफ जस्टिस नहीं बन पाएंगे.

जस्टिस जे. चेलामेश्वर द्वारा दिया गया हालिया बहुचर्चित फैसले निजता के अधिकार को लेकर रहा. सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने हाल ही में सर्वसम्मति से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया, जिसमें जस्टिस चेलामेश्वर भी शामिल थे.

शुक्रवार को जजों द्वारा रिश्वत लिए जाने के जिस मामले पर यह सारा ड्राम हुआ, उसे एक NGO कैंपेन फॉर जुडिशल अकाउंटेबिलिटी एंड जुडिशल रिफॉर्म्स (CJAR) ने दायर किया था. वरिष्ठ वकील कामिनी जायसवाल ने खुद अपने NGO की ओर से यह याचिका दायर की थी.

दोनों अन्य वकील प्रशांत भूषण और दुष्यंत दवे इस मामले में कामिनी के सहयोगी वकील का काम कर रहे थे. यह मामला मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से जुड़ा हुआ था. मामले में एक सेवानिवृत्त जज के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, जिसमें लखनऊ के एक प्रतिबंधित मेडिकल कॉलेज के प्रबंधकों को सुप्रीम कोर्ट में अनुकूल फैसला हासिल करने का आश्वासन देना भी शामिल है. इसके अलावा पीठ सरकार द्वारा 46 मेडिकल कॉलेजों पर प्रवेश से लगाए गए प्रतिबंध के मामले में अनुकूल फैसला हासिल करने के लिए रिश्वत देने के मामले पर भी सुनवाई कर रहा था.

शुक्रवार की सुनवाई के दौरान प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण अपना पक्ष न सुने जाने का आरोप लगाते हुए मामले पर सुनवाई बीच में छोड़कर कोर्टरूम से बाहर निकल गए थे

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