CBI और ED इस वजह से तेजस्वी-राबड़ी पर नहीं कर रही है कड़ी कार्रवाई

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किसी साधारण व्यक्ति या आमतौर पर किसी व्यवसायी को सीबीआइ और ईडी का सम्मन मिल जाये, तो वह हर हाल में इन एजेंसियों के सामने उपस्थित होता है. बिहार के सबसे बड़े सियासी परिवार की राजनीतिक विरासत संभालने को बेचैन राजद नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के साथ ऐसा नहीं है. जी हां, सीबीआइ हो या ईडी तेजस्वी-राबड़ी को लगातार हाजिर होने के लिए नोटिस जारी कर रहे हैं. उपस्थित दोनों में से कोई नहीं हो रहा है. ईडी ने रेलवे टेंडर घोटाले में बेनामी संपत्ति को लेकर पूछताछ के लिए तेजस्वी यादव को सातवां नोटिस जारी किया है. तेजस्वी को आज यानी सोमवार को दिल्ली बुलाया गया है. इससे पूर्व तेजस्वी सिर्फ एक बार सीबीआइ के सामने पूछताछ के लिए पेश हुए हैं. इससे पूर्व उन्हें कई बार नोटिस जारी हुआ, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुए. यही हाल पूर्व सीएम राबड़ी देवी का है, वह लगातार ईडी की नोटिस को लगातार नजरअंदाज कर रही हैं. इसी महीने सात नवंबर (मंगलवार) को भी दिल्ली स्थित ईडी दफ्तर में राबड़ी पूछताछ के लिये नहीं पहुंचीं. ईडी के अधिकारी काफी देर तक उनका इंतजार करते रहे लेकिन वो नहीं पहुंचीं. सवाल यह उठता है कि यह दोनों एजेंसियां नोटिस की अवहेलना करने वाले मां- बेटे पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है?

कानूनी मामलों के जानकार और पटना हाइकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील कुमार कहते हैं कि अगर संवैधानिक रूप से देखा जाये, तो यह दोनों एजेंसिया तेजस्वी और राबड़ी देवी के खिलाफ नोटिस की अवहेलना को लेकर अदालत जा सकती हैं, साथ ही दोनों लोगों के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट भी ले सकती हैं, जैसा कि विजय माल्या के केस में हुआ था. सुनील कुमार मानते हैं कि तेजस्वी और राबड़ी के मामले में ईडी और सीबीआइ सिर्फ स्वाभाविक कार्यशैली अपना रही हैं और इन एजेंसियों की कार्रवाई में पूर्व की तरह ही राजनीतिक प्रभाव दिखता है. वहीं दूसरी ओर राजनीतिक मामलों के जानकर प्रमोद दत्त कहते हैं कि फिलहाल ईडी राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को तब तक ऐसे ही नोटिस जारी करती रहेगी, जब तक गुजरात चुनाव खत्म नहीं हो जाता है. उनका कहना है कि जांच एजेंसियों को डर है कि लालू प्रसाद यादव परिवार के खिलाफ किसी तरह की कड़ी कार्रवाई को विपक्ष गुजरात चुनाव के दौरान मुद्दा बना सकता है. कांग्रेस पहले ही सीबीआइ और ईडी पर केंद्र सरकार के इशारे पर विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच शुरू करने और जान बूझकर उन्हें परेशान करने का आरोप लगाती रही है. सीबीआइ नहीं चाहती है कि उसकी कार्रवाई चुनावी राजनीति का मुद्दा बने. इससे जांच एजेंसी की छवि खराब होती है और विपक्षी नेताओं को अकारण एजेंसियों पर हमला करने का अवसर मिल जाता है.

राजनीतिक हल्कों में चल रही चर्चा के मुताबिक बेनामी संपत्ति और रेलवे टेंडर घोटाला मामले में राजद सुप्रीमो लालू यादव का पूरा परिवार लगभग फंसा हुआ है. सीबीआइ और ईडी की छापेमारी झेल चुका परिवार अब इन एजेंसियों की नोटिस को गंभीरता से नहीं ले रहा है. जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार का मानना है कि दोनों एजेंसियों ने साक्ष्य जमा करने के बाद इन पर मामला दर्ज किया है, दोनों एजेंसियां लगातार तेजस्वी और राबड़ी को अपनी बात रखने का मौका दे रही हैं. ऐसा नहीं है कि कोई कार्रवाई नहीं होगा. जब सीबीआइ और ईडी को यह पता चल जायेगा कि इन्होंने अपने पक्ष को पूरी तरीके से उनके सामने रख दिया है, उसके बाद कार्रवाई हो सकती है. वहीं ईडी के सूत्रों की मानें तो इस मामले में एजेंसी किसी जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहती है. हालांकि, ईडी के पास इस बात का कोई नहीं है कि विजय माल्या के खिलाफ तीन समन के बाद ही गिरफ्तार वारंट के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा दिया गया. यही नहीं, तीन महीने के भीतर ही विजय माल्या को भगोड़ा भी घोषित करा दिया गया था.

पूरे मामले में सीबीआइ अब थोड़ी शांत हो गयी है. शुरुआती पूछताछ के बाद यह एजेंसी अब बिल्कुल एक्शन में नहीं है. वहीं राजनीतिक जानकारों की मानें, तो इसका सीधा कारण गुजरात चुनाव है, क्योंकि कांग्रेस इस मुद्दे को लपक सकती है. फिलहाल, तेजस्वी और राबड़ी लगातार नोटिस पर अनुपस्थित होने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं. वहीं लालू यादव लगातार सार्वजनिक मंच से एजेंसियों से नहीं डरने की बात कर रहे हैं. तेजस्वी भी कई बार केंद्र सरकार और बिहार सरकार पर जान बूझकर पूरे परिवार को परेशान करने का आरोप लगा चुके हैं. आज तेजस्वी यादव यदि ईडी की नोटिस पर उपस्थित नहीं होते हैं, तो यह बात सच साबित होगी कि दोनों एजेंसियां किसी राजनीतिक गाइड लाइन के तहत काम कर रही हैं.

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