जब स्कूटर पर ढोए गए थे 10 बैल, जानिए चारा घोटाले की कहानी

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1996 में चारा घोटाला मामले का खुलासा हुआ था और उसके बाद जब सीबीआइ ने जांच की तो पता चला कि इस घोटाले में स्कूटर पर दस-दस बैल ढोए गए थे और साथ ही सौ क्विंटल चारा भी ढोया गया था।
पटना । वर्ष 1996 में हुए चारा घोटाले की गूंज देश सहित विदेशों में भी सुनाई दी थी। बिहार के इस बहुचर्चित घोटाले के खुलासे के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को अपनी कुर्सी भी गंवानी पड़ी थी। इतना ही नहीं इस घोटाले में सीबीआइ ने जब जांच शुरू की तो इसमें कुल 56 आरोपियों के नाम सामने आए थे, जिनमें राजनेता, अफसर और चारा सप्लायर शामिल थे।
चारा घोटाले में 16 लोगों को दोषी करार दिया गया
27 जनवरी 1996 को दर्ज हुए इस घोटाले के केस में सीबीआइ की अदालत ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव समेत 15 लोगों को कोर्ट ने दोषी करार दिया और विभिन्न मामलों की सुनवाई आज भी जारी है और आज फिर से कोर्ट लालू यादव को देवघर कोषागार से अवैध निकासी मामले में सजा सुना सकती है। इसमें से कोर्ट ने सात आरोपियों को बरी कर दिया है।
बिना देखे-परखे किया गया था बिल पर साइन
इस घोटाले का जब खुलासा हुआ तो पशुपालन विभाग के अधिकारी व ट्रेजरी ऑफिसर से लेकर सरकार के मंत्री और मुख्यमंत्री तक जुड़े थे। घोटाले के खुलासे में कहा गया है कि पशुओं के लिए खरीदे गए चारे का फर्जी बिल बनाकर कोषागार को भेजा जाता था और उसके बाद कोषागार के अफसर इस बात की बगैर जांच किए कि बिल सही है या नहीं, चारा की खरीद हुई या नहीं, इसे देखे बिना ही पैसे जारी कर दिए जाते थे।
स्कूटर पर ढोए गए थे दस-दस पशु और सौ-सौ क्विंटल चारा
उस वक्त किसी को यह पता नहीं था कि चारा घोटाले का खुलासा होगा और इस तरह की जांच होगी। जब जांच हुई तो पता चला कि कोषागार से अवैध निकासी के पैसे में सभी की हिस्सेदारी पहले से तय होती थी। इस घोटाले में शामिल लोगों ने पशुओं के चारा के अलावा पशुओं को ढोने के वाहन से लेकर दवा खरीद तक हर काम के लिए फर्जी बिल बनाए और पैसे निकाल लिए।
जांच जब आगे बढ़ी तो खुलासा हुआ कि अफसरों ने एेसे बिल पर साइन किए जिसमें सौ-सौ क्विंटल चारा और दस से बारह बैल जिस वाहन पर भेजे उसका नंबर जब खंगाला गया तो वह नंबर स्कूटर का निकला जिसपर बैल और चारा ढोया गया था। जांच करने वाले अफसर भी हैरान हो गए जब उन्हें पता चला कि स्कूटर पर बैल-भैंस-गाय और चारा ढोया गया।
जांच में हुआ खुलासा-ना चारा खरीदा गया ना पशु ढोए गए
फिर सीबीआई की जांच में पता चला कि कोषागार से निकाले गए पैसे से न तो चारा ही खरीदा गया था ना ही उसे पशुओं के लिए फॉर्म हाउस पहुंचाया गया था और ना ही गाय-बैल-भैंस ढोए गए थे। सब काम कागज पर कर लिया गया था और घोटालेबाजों के रैकेट से पशुपालन विभाग के अधिकारी व ट्रेजरी ऑफिसर से लेकर सरकार के मंत्री और मुख्यमंत्री तक जुड़े थे।
बिहार और झारखंड तब एक ही राज्य थे। तब बिहार पुलिस ने 1994 में गुमला, रांची, पटना, डोरंडा और लोहरदगा जैसे कई कोषागारों से फर्जी बिलों के जरिए करोड़ों रुपए गैर कानूनी तरीके से निकालने के मामले दर्ज किए थे। इस मामले में सरकारी ट्रेजरी और पशुपालन विभाग के कई कर्मचारी गिरफ्तार किए गए थे।
तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू ने भी दी थी पैसे निकाषी की मंजूरी
लालू यादव तत्कालीन मुख्यमंत्री थे और सीबीआई के मुताबिक लालू यादव को न सिर्फ इस घोटाले की जानकारी थी, बल्कि उन्होंने वित्त मंत्रालय के प्रभारी के रूप में इन पैसों को निकालने की अनुमति भी दी थी। मामले के खुलासे के बाद सीबीआइ ने लालू के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया और उसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और वे कई महीनों तक जेल में रहे।
चारा घोटाला मामले में दस नेता और आठ अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा
31 मई 2007 को सीबीआई के स्पेशल जज यूएसपी सिन्हा ने आरसी 66 (ए)-96 के तहत 82 लोगों को सजा सुनाई थी, जिनमें लालू प्रसाद के दो भतीजे वीरेंद्र यादव और नागेंद्र राय भी शामिल थे। इस मामले में 10 बड़े नेता और आठ अफसरों के खिलाफ मुकदमा भी किया गया था।
चारा घोटाले की सुनवाई के दौरान बिहार के पूर्व पशुपालन मंत्री भोलाराम तूफानी, पूर्व केंद्रीय मंत्री चंद्रदेव प्रसाद वर्मा, पूर्व सांसद राजो सिंह की मौत हो गई है और बाकी दोषियों में लालू प्रसाद, डॉ. जगन्नाथ मिश्र, पीएसी के पूर्व चेयरमैन ध्रुव भगत, जगदीश शर्मा, आरके राणा, विद्यासागर निषाद, पीएसी की पूर्व मेंबर ज्योति कुमारी शामिल हैं।
तो वहीं, अफसरों में पूर्व पशुपालन सचिव आईएएस बेक जूलियस, श्रम सचिव के अरुमुगम, महेश प्रसाद, एमसी सुवर्णो, फूलचंद सिंह, एसएन दुबे, एसी चौधरी शामिल हैं।

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