एक समय था आईएफएस ऑफिसर, अब जी रहा है लोगों के रहमोकरम पर

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कब किसका वक्‍त पलटी मार जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है। सब कुछ बहुत अच्‍छा चल रहा होता है, मगर अचानक कुछ ऐसा घटता कि आप अर्श से फर्श पर आ जाते हो।
जयपुर,। वक्त की मार किसी इंसान को कहां से कहां पहुंचा देती है, इसका उदाहरण हैं डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा। उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर निवासी शर्मा तीन विषषयों में डॉक्टरेट और भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं, लेकिन तीन दिन पहले तक राजस्थान के झालावाड़ में एक रैन बसेरे में जिंदगी गुजार रहे थे।
एक कैंटीन संचालक के बच्चों को पढ़ाते थे और इसके बदले उन्हें दो समय का खाना नसीब हो रहा था। उनकी कहानी सामने आई तो प्रशासन जागा और अब वह झालावाड़ मेडिकल कॉलेज की लाइब्रेरी में छात्रों को गाइड कर रहे हैं। कॉलेज के हॉस्टल में ही उनके रहने-खाने की व्यवस्था भी कर दी गई है।
1960 के बैच के थे टॉपर शर्मा
गोपाल कृष्ण शर्मा भारतीय विदेश सेवा के 1960 के बैच के टॉपर थे और इनकी पहली पोस्टिंग फ्रांस में हुई थी। वह नीदरलैंड्स में भारत सरकार के राजनीतिक सलाहकार रहे। 1977 में विदेश सेवा से इस्तीफा देकर वह ढ्ढह्यूमन इकोलॉजी काउंसिल जेनेवा के चेयरमैन रहे। यहां से उन्हें मासिक पेंशन भी मिलती थी, जो उन्होंने आजीवन मुंबई के एक वृद्धाश्रम को दान दे दी और यह प्रण लिया कि वह आजीवन इस वृद्धाश्रम का फायदा नहीं लेंगे।
पत्‍नी मिथिलेश भी थीं डॉक्‍टर
शर्मा इलाहबाद विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर भी रहे। उनकी पत्नी मिथिलेश भी डॉक्टर थीं, लेकिन 1985 में उनकी मौत हो गई। उनके नोयजा स्थित मकान पर दबंगों का कब्जा हो गया था और पैसे हर्षद मेहता के शेयर घोटाले में डूब गए थे।
अजीब है बर्बादी की कहानी
शर्मा की बर्बादी की कहानी अजीब है। उनका नोएडा में मकान था, लेकिन वह मेरठ में रह रहे थे। इसी दौरान बाहुबलियों ने नोएडा स्थित उनके मकान पर कब्जा कर लिया। उनके पास जो जमापूंजी थी, वह एक दोस्त के कहने पर उन्होंने शेयर बाजार में हर्षद मेहता की कंपनी में लगा दी, जो बाद में डूब गई। दबंगों ने मेरठ में भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। ऐसे में एक मित्र के कहने पर वह कोटा आ गए। कोटा में हॉस्टल वॉर्डन का काम किया।
इसके बाद किसी अधिकारी के कहने पर झालावाड़ आ गए, यहां एक निजी स्कूल में पढ़ाने लगे, लेकिन वह काम ज्यादा नहीं चल पाया। इसके बाद एक कैंटीन संचालक ने उन्हें संभाला। वह उसके बच्चों को पढ़ाते थे। रैन बसेरे में रह रहे थे और कैंटीन में खाना खाते थे।
मेडिकल कॉलेज बना आसरा
तीन दिन पहले उनकी कहानी सामने आई तो प्रशासन ने सहारा दिया। यहां के सरकारी मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. आरके असारिया ने उन्हें कॉलेज की लाइब्रेरी में अपनी सेवाएं देने को कहा। शर्मा भी ऐसा ही कुछ काम चाहते थे क्योंकि उन्हें पढ़ने का काफी शौक है। अब वह यहां के छात्रों को उनके काम की किताबें ढूंढने में मदद करेंगे। हॉस्टल में ही उनके रहने और खाने की व्यवस्था भी कर दी गई है।

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