नेपाल में स्थिरता कायम करने का मौका, चूकने पर तरक्की की राह नहीं होगी आसान

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नेशनल असेंबली का चुनाव नेपाल में संसदीय लोकतंत्र की मजबूत बुनियाद डालने का ऐतिहासिक अवसर लेकर आया है। इस बार भी अगर सियासी दल चूक गए तो नेपाल में राजनैतिक स्थिरता और आर्थिक तरक्की की राह आसान नहीं होगी नेपाल में नेशनल असेंबली यानी राष्ट्रीय पंचायत का चुनाव आठ फरवरी को होना है। इसकी वजह से वहां राजनीतिक जोर आजमाइश चल रही है। उम्मीदवारों के चयन में ही राजनीतिक धड़ेबंदी हावी होगी। यह चुनाव चूंकि विभिन्न विधायी सदनों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के मत से होगा, इसलिए तूती उन्हीं की बोलेगी जिन्हें संसद, प्रांतीय विधायी सदनों और स्थानीय निकायों में बहुमत मिल चुका है। इसके बाद ही नया संविधान लागू होने की प्रक्रिया पूरी होगी। साथ ही प्रांतीय सदनों के गठन और उनकी नई राजधानियां चुनने का काम भी शुरू होगा।

हाल के प्रांतीय और संसदीय चुनाव के बाद राष्ट्रीय पंचायत यानी भारत की राज्यसभा जैसे संसद के ऊपरी सदन का चुनाव होने पर ही नई सरकार भी अपना कार्यभार संभाल पाएगी। संविधान के मुताबिक, संसद के दोनों सदनों के गठन के बाद ही नए प्रधानमंत्री का चुनाव हो सकता है। राष्ट्रीय पंचायत के चुनाव कराने की घोषणा नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की अध्यक्षता में हुए फैसले के बाद स्थानीय चुनाव आयोग ने की है। नेपाल के 753 स्थानीय निकायों के प्रमुख एवं उपप्रमुख और प्रांतीय असेंबलियों के सदस्यों वाला निर्वाचक मंडल नेशनल असेंबली के 59 में से 56 सदस्य चुनेगा। बाकी तीन सदस्यों को सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति मनोनीत करेंगे। नेपाल के चुनाव आयोग के अनुसार ऊपरी सदन के चुनाव के बिना वह आनुपातिक प्रतिनिधित्व के तहत निचले सदन की सीट भी आवंटित नहीं कर सकता।

नेपाली संसद के दो सदन हैं। इनमें प्रतिनिधि सभा के 275 सदस्यों में से 165 प्रत्यक्ष मतदान और 110 परोक्ष मत प्रणाली से चुने गए हैं। राष्ट्रीय पंचायत, संसद का दूसरा सदन है। इसमें हरेक प्रांत के विधायक, आठ सदस्यों को चुनेंगे। बाकी तीन सदस्यों को राष्ट्रपति नामांकित करेंगे। सात प्रांतीय विधान सभाओं में कुल 550 सदस्य हैं। इनमें से 330 सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचित और 220 परोक्ष मत प्रणाली से चुने गए हैं। प्रत्यक्ष संसदीय एवं प्रांतीय सदनों के चुनाव में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-एमाले और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी ने जबरदस्त जीत पाई है।

वाम गठबंधन ने नेपाल की संसद यानी प्रतिनिधि सभा की 165 प्रत्यक्ष चुनाव वाली सीटों में दो-तिहाई से अधिक यानी 113 सीट जीती हैं। भंग सदन में सबसे अधिक सदस्यों वाली नेपाली कांग्रेस के पल्ले 21 प्रत्यक्ष सीट ही आई हैं। संसदीय चुनाव में दो मधेसी दल 19 सीट जीते हैं। राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल की 10 पर और फेडरल सोशलिस्ट फोरम नेपाल की नौ सीट पर जीत हुई है। इस जीत के पीछे इन दोनों दलों के गठबंधन से मतदाता के मन में 11 साल पुरानी राजनीतिक अनिश्चितता खत्म होने की उम्मीद है। वाम मोर्चे का नारा भी था,‘समृद्धि के लिए स्थिरता’। पिछले 11 साल में नेपाल ने 10 प्रधानमंत्री झेले हैं।

साथ ही उनकी जीत में मधेसियों के मुद्दे पर भारतीय सीमा से नेपाल की करीब दो महीने लंबी अघोषित आर्थिक नाकेबंदी का भी हाथ माना जा रहा है। वाम मोर्चा अब संसद यानी प्रतिनिधि सभा ही नहीं बल्कि सात में से छह प्रांतीय विधानसभाओं में भी बहुमत पा गया है। इतनी बड़ी जीत की बदौलत वाम मोर्चे की सरकार को अब कम से कम बाहर से कोई खतरा नहीं रहेगा। 1999 के 18 साल बाद पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने के कारण नेपाल का यह चुनाव ऐतिहासिक है। राष्ट्रीय पंचायत के चुनाव परिणाम के साथ ही नवंबर 2006 में शुरू राजनीतिक प्रक्रिया निपट जाएगी। राजनीतिक स्थिरता ने गरीबी से त्रस्त इस पहाड़ी देश में आर्थिक तरक्की के आसार बनेंगे। प्रचंड के नेतृत्व वाले विद्रोही माओवादियों के साथ शांति समझौते ने यह प्रक्रिया शुरू की थी। इसके तहत राजशाही को खत्म करके नेपाल को संघीय गणतांत्रिक देश घोषित किया गया था।

वाममोर्चा की तरफ से खड़्ग प्रसाद ओली का प्रधानमंत्री बनना तय माना जा रहा है। इस मोर्चे के दूसरे बड़े नेता माओवादी पुष्पकमल दहल प्रचंड हैं। दहल ने भारत की पहल पर 2006 में लोकतांत्रिक मुख्यधारा में शामिल होने से पहले राजसत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा था। इन दोनों ही नेताओं के बीच बारी-बारी से प्रधानमंत्री पद बंटेगा। हालांकि दोनों ही दलों ने अंतत: आपस में विलय करके एक ही वामपंथी दल बनाने की घोषणा की है। इसमें भी चूंकि दहल की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों की संख्या सदन में कम है, इसलिए वे सरकार बनने से पहले ही दोनों दलों का विलय चाहते हैं। इससे दहल एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष बन जाएंगे और एमाले नेता ओली प्रधानमंत्री पद संभाल लेंगे। इससे सत्ता का संतुलन बना रहेगा। हालांकि नेपाल का संविधान संसद एवं प्रांतीय विधायी सदनों तथा सरकार के गठन के बारे में स्पष्ट नहीं है।

संविधान को नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर प्रमुख राजनीतिक दलों व नेताओं की आपसी सहमति से आनन फानन तैयार किया गया है। इसलिए इसमें अनेक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं संबंधी प्रावधान अस्पष्ट हैं। संविधान में मूलवासियों तथा मधेसियों के हितों की अनदेखी के भी ठोस सबूत मौजूद हैं। इस लिहाज से ऊपरी सदन के चुनाव पूरे होने पर बनने वाली सरकार के सामने चुनौतियों का अंबार लगने वाला है। फिलहाल प्रधानमंत्री देउबा और राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी के बीच भी इस ऊपरी सदन के गठन पर विवाद छिड़ा हुआ है। देउबा चूंकि नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं और विद्यादेवी एमाले की सदस्य रही हैं। इसलिए दोनों ही नेता नेशनल असेंबली में अपने ज्यादा से ज्यादा समर्थकों के चुने जाने के पक्ष में हैं। खींचतान बढ़ी तो नई सरकार बनने में भी और देर हो जाएगी।

संविधान को लागू करके जल्द से जल्द नई सरकार एवं विधायी व्यवस्था की स्थापना के लिए हालांकि सभी दलों को आपस में सहयोग करना पड़ेगा। इसके बगैर विधायी सदनों में एक-तिहाई महिला सदस्यों की उपस्थिति और समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। साथ ही यदि प्रमुख राजनीतिक दल चाहें तो संविधान में जिन जातीय एवं नस्लीय समूहों की उपेक्षा का आरोप लग रहा है उन्हें ऊपरी सदन के गठन में तवज्जो देकर उनका असंतोष दूर किया जा सकता है। इस लिहाज से नेपाल में संसदीय लोकतंत्र की मजबूत बुनियाद डालने और राजनीतिक सद्भाव स्थापित करने का यह ऐतिहासिक मौका है। यदि इस बार भी नेता आपसी खींचतान में मुब्तिला होकर चूक गए तो नेपाल में राजनैतिक स्थिरता और आर्थिक तरक्की की राह आसान नहीं होगी।

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