बिहार में राजनीतिक गठबंधनों का इम्तिहान लेता रहा है उपचुनाव, जानिए

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बिहार में तीन लोकसभा और विधानसभा की सीट के लिए उपचुनाव की तिथि की घोषणा हो चुकी है। अब तमाम राजनीतिक दलों में सीट की उम्मीदवारी के लिए खीचंतान जारी है।

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पटना । बिहार में लोकसभा की एक और विधानसभा की दो सीटों पर 11 मार्च को होने जा रहे उपचुनाव के नतीजों के जरिए प्रदेशव्यापी जनादेश का आकलन नहीं किया जा सकता है। प्रदेश की चुनावी तासीर सुशासन के मुद्दों के साथ-साथ गठबंधनों की मजबूती एवं जातीय गोलबंदी के आधार पर तय होती है।

बिहार में आम चुनावों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि किस खेमे ने कितना मजबूत गठबंधन कर रखा है। वर्ष 2005 में राजग के सत्ता में आने के बाद से बिहार में हुए उपचुनावों के आंकड़ों पर अगर गौर करें तो साफ पता चलता है कि किसी सफलता में निरंतरता नहीं रही है।

वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद खाली हुई विधानसभा की 18 सीटों पर उसी साल सितंबर में उपचुनाव हुए थे। तब बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा-जदयू गठबंधन की सरकार थी। माना जा रहा था कि बिहार में राजग का मजबूत प्रदर्शन रहेगा, किंतु परिणाम उल्टे आए। 18 सीटों में से राजग को महज छह सीटें मिली।

जदयू को चार और भाजपा को दो। तब कांग्रेस ने बिना किसी गठबंधन के अलग चुनाव लड़कर अपने दम पर दो सीटें प्राप्त कर ली थी। एक बसपा और एक निर्दलीय के खाते में भी गई थी। हैरत की बात यह कि बिहार में लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन नहीं करने वाले राजद-लोजपा गठबंधन ने आठ सीटें अपनी झोली में डाल ली थीं।
राजद को पांच और लोजपा को तीन सीटें मिली थीं। उससे भी ज्यादा हैरत यह कि उपचुनाव के नतीजों के महज एक साल बाद ही बिहार विधानसभा के आम चुनाव में राजग को प्रचंड बहुमत मिला और नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा-जदयू की सरकार बनी।

राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार के मुताबिक उपचुनाव के नतीजों के आधार पर बदलाव की जो कल्पनाएं कर ली जाती हैं, वे पूरी तरह सत्य के करीब नहीं होतीं। उपचुनावों के नतीजे सिर्फ आम चुनाव की तैयारी कर रही बड़ी पार्टियों को आगाह भर करते हैं।

बाद के उपचुनाव के नतीजे तो और भी हैरतअंगेज रहे। बिहार विधानसभा की 10 सीटों पर उपचुनाव अगस्त 2014 में कराए गए थे। लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के सहारे प्रचंड बहुमत से केंद्र की सत्ता में आई भाजपा को उपचुनाव के नतीजों ने निराश किया। उसे दस में से सिर्फ चार सीटों से संतोष करना पड़ा, जबकि महज ढाई महीने पहले लोकसभा चुनाव में उन्हीं दस सीटों में से आठ पर भाजपा प्रत्याशी ने बढ़त बनाई थी।

भाजपा से अलग होकर राजद से दोस्ती करने वाले जदयू गठबंधन को छह सीटें मिल गईं। यह लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की दोस्ती का पहला इम्तिहान था, जिसमें दोनों सफल साबित हुए। भाजपा ने एक सीट अपने सहयोगी लोजपा को दी थी, जिसपर वह हार गई।
सबसे चर्चित रहा था 1993 का उपचुनाव
बिहार में सबसे चर्चित उपचुनाव 1993 में वैशाली लोकसभा का हुआ था, जिसमें बिहार पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद को जीत मिली थी। उन्होंने किशोरी सिन्हा को 17 हजार से अधिक मतों से हराया था। लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले जनता दल के सांसद शिवशरण सिंह के निधन के बाद हुए इस उपचुनाव में कई दिग्गज मैदान में थे।
कांग्रेस से इस्तीफा देकर निखिल कुमार की मां किशोरी सिन्हा जनता दल की प्रत्याशी बनी थीं। भाजपा से सुरेश शर्मा और कांग्र्रेस से महेश सिन्हा की बेटी उषा सिन्हा उम्मीदवार थीं। उसी चुनाव के दौरान पहली बार लालू और नीतीश में वैचारिक मतभेद हुआ था, जिसके कारण किशोरी सिन्हा को नीतीश का समर्थन नहीं मिला था।

बिहार में दूसरे चर्चित उपचुनाव में 2013 में लोकसभा की महाराजगंज सीट पर हुआ था, जिसमें राजद उम्मीदवार प्रभुनाथ सिंह ने जदयू प्रत्याशी एवं राज्य सरकार के मंत्री पीके शाही को हराया था। यह चुनाव राजद सांसद उमाशंकर सिंह के निधन के कारण हुआ था।
दिलचस्प यह भी था कि आम चुनाव में यही प्रभुनाथ सिंह जदयू के प्रत्याशी थे और राजद के उमाशंकर सिंह से हार गए थे। बाद में पार्टी बदलकर प्रभुनाथ लालू के साथ खड़े हो गए।

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