सीट ही नहीं आम-लीची के लिए भी नाराज हो चुके हैं जीतनराम मांझी

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जीतनराम मांझी के राजग छोड़ महागठबंधन में जाने की घोषणा से बिहार की राजनीति उबाल पर है। राजनीतिक कारणों से नाराज होते रहे मांझी कभी आम-लीची के लिए भी नाराज हुए थे। जानिए मामला।
पटना । बिहार की राजनीति में हिंदुस्‍तानी अवाम मोर्चा (हम) के मुखिया जीतनराम मांझी की चर्चा के पहले एक घटना का उल्‍लेख जरूरी है। साल 2015 में मुख्‍यमंत्री पद से इस्‍तीफा देने के बाद कुछ दिनों तक वे मुख्‍यमंत्री आवास में ही रुके थे। तब परिसर में फले आम-लीची के लिए उनका मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार से झंझट हो गया था। राजनीति की बात करें तो छोटी-बड़ी मांगें पूरी नहीं होने पर मांझी कई बार बगावत पर उतरे। यहां भी रूठने-मनाने का खेल चलता रहा। अंतत: उन्‍होंने महागठबंधन में जाने की घोषणा कर दी है।
ऐसे मुख्‍य धारा की राजनीति में आए मांझी
बिहार में बीते लोकसभा चुनाव में हार की जिम्‍मेदारी लेते हुए मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने नैतिकता के आधार पर पद से इस्‍तीफा दे दिया था। विधायक दल द्वारा दोबारा नेता चुने जाने के बावजूद वे मुख्‍यमंत्री बनने के लिए राजी नहीं हुए। उनके तत्‍कालीन अनुसूचितजाति-जनजाति कल्याण मंत्री जीतनराम मांझी को मुख्‍यमंत्री बना दिया। इसके बाद राजनीति के हाशिए से वे मुख्‍यधारा में आ गए।
मुख्‍यमंत्री रहते कहा: अफसर नहीं सुनते बात
इसके बाद अगले 10 महीने तक मांझी के पास सत्‍ता थी। लेकिन, हमेशा इस बात का रोना रोते रहे कि भले ही वे मुख्‍यमंत्री हों, सत्‍ता प्रतिष्‍ठान पर नीतीश कुमार की पकड़ बरकरार है। मांझी की हमेशा यह शिकायत रही कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते और नीतीश कुमार रिमोट से सरकार चलाते हैं।
पार्टी ने निकाला तो ठानी कुर्सी नहीं छोड़ने की जिद
कालक्रम में घटनाक्रम ने मोड़ लिया और 10 महीने बाद पार्टी ने मांझी को पद छोड़ने को कहा। मांझी के इन्‍कार पर पार्टी ने उन्‍हें निष्‍कासित कर दिया। इसके बाद मांझी ने सदन में विश्‍वास मत हासिल करने की जिद ठान ली, लेकिन विफल रहे।
नहीं छोड़ा सीएम आवास, हुआ आम-लीची का विवाद
नीतीश कुमार फिर मुख्‍यमंत्री बन गए तो मांझी ने मुख्‍यमंत्री आवास को तुरंत खाली नहीं करने की जिद ठानी। मजबूरन मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार को एक अणे मार्ग स्थित मुख्‍यमंत्री आवास के बदले 7, सर्कुलर रोड स्थित आवास पर रहना पड़ा। इसी दौरान एक अणे मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास परिसर में फले आम-लीची का विवाद समाने आया था। तब मांझी ने कहा था कि नीतीश कुमार ने उनसे फलों की ‘रक्षा’ के लिए 24 पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी है।
‘हम’ के प्रवक्ता दानिश रिजवान ने बाकायदा बयान दिया कि मांझी या उनके परिजन अपने वर्तमान आवास से आम, कटहल या लीची न तोड़ लें इसके लिये एक अणे मार्ग में आठ अवर निरीक्षक और 16 आरक्षियों की तैनाती की गयी है। रिजवान ने मांझी को रहने के लिये आवास के सिवा अन्य कोई सुविधा नहीं देने का आरोप लगाते हुए कहा कि उनका फोन और टीवी केबल कनेक्शन तक काट दिया गया है। मांझी के इस आरोप पर तब खूब राजनीति हुई थी।
कांग्रेस व राजद से रहा पुराना नाता
जीतनराम मांझी की घोषणा के बाद उनकी राजनीति का पहिया फिर घूमकर फिर राजद-कांग्रेस से जा मिला है।
मांझी 1990 तक कांग्रेस सदस्य रहे थे। वे कांग्रेस के टिकट पर 1980 से 1990 तक कांग्रेस विधायक रहे। इसके बाद वे राजद में चले गए। 1996 से 2005 में वे राजद विधायक बने। 2005 में वे जदयू में आकर नीतीश सरकार में मंत्री बने। आगे नीतीश कुमार ने उन्‍हें मुख्‍यमंत्री भी बनाया और हटाया।
राजग में ऐसे दलित राजनीति के हाशिए पर गए
इसके बाद मांझी ने आठ मई, 2015 को हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा नामक पार्टी बनाई और राजग का हिस्‍सा बने। राजग के साथ उनका सफर बुधवार तक चला।
मांझी 2015 का विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए राजग में शामिल हो गए। राजग में उन्‍हें बिहार की दलित राजनीति के एक बड़े चेहरे के रूप में जगह मिली। उनकी बात सीणे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह से होती थी। पर, उन्‍हें केवल एक सीट पर ही जीत मिली। 2015 के चुनाव में महागठबंधन को मिली सफलता ने राजग में मांझी की ‘दलित’ राजनीति को हाशिए पर धकेल दिया। रही-सही कसर जुलाई, 2017 में महाबठबंधन में पड़ी दरार ने तब पूरी कर दी, जब जदयू ने भाजपा के साथ बिहार में राजग की सरकार बना ली।
मांझी छोड़ेंगे राजग का साथ, बयानों से लग रहे थे कयास
बीते कुछ समय से मांझी के राजग से अलग होने के कयास लगाए जा रहे थे। खुद मांझी के आए दिन आ रहे बयान इसे बल दे रहे थे। हाल में मांझी ने मांग की थी कि उनके मुख्यमंत्री रहते किये गये फैसलों को नीतीश सरकार लागू करे। आगे उन्‍होंने यह धमकी भी दी थी कि आठ अप्रैल के बाद उनकी राह अलग होगी। मांझी ने अपनी पार्टी के अकेले विधानसभा और लोकसभा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी।
उपचुनाव में सीटों के बंटवारे ने बढ़ा दी दरार
विधानसभा उपचुनाव की घोषणा के बाद मांझी ने जहानाबाद विधानसभा सीट पर अपना दावा ठोंका। लेकिन, नाटकीय घटनाक्रम में यह सीट जदयू के खाते में चली गई। इससे मांझी को धक्‍का लगा।
चर्चा रही कि उनकी पार्टी से वृषिण पटेल ने रांची जेल जाकर लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। इस बीच राजद व कांग्रेस के स्‍टैंड मांझी के प्रति मुलायम होते दिखे। राजद उपाध्‍यक्ष डॉ. रधुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि मांझी राजग में घुटन महसूस कर रहे हैं। राजद के भाई वीरेंद्र ने कहा कि लालू भी मांझी को दिल से मानते हैं। जले पर नमक छिड़कता बयान कांग्रेस अध्यक्ष कौकब कादरी का आया। उन्‍होंने कहा कि मांझी को जहानाबाद सीट मिलनी चाहिए थी।
आगे मांझी ने राज्‍यसभा चुनाव के लिए अपनी दावेदारी देश करते हुए सवाल किया कि हमेशा उनकी पार्टी ही कुर्बानी क्‍यों दे? मांझी ने भी कहा कि जो उनकी शर्तों को मानेगा, वे उसका साथ देंगे। इशारा स्‍पष्‍ट था। लालू के करीबी भोला यादव ने मांझी को राजद के साथ आने का न्‍योता दिया तो उन्‍होंने भी देर नहीं की। फिर, तेजस्‍वी यादव व तेजप्रताप यादव के मांझी के घर जाकर मुलाकात के बाद मांझी ने बुधवार को महागठबंधन में जाने की घोषणा कर दी है।
राजद से हुई इस डील की चर्चा
चर्चा है कि एक राज्‍यसभा सीट, गया लोकसभा सीट तथा विधान परिषद की तीन सीटें ‘हम’ को देने पर सहमति के बाद मांझी महागठबंधन में गए हैं। अब आगे-आगे देख्रिए होता है क्‍या।

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