उपचुनाव 2018: चार साल में छिन गई 62 साल में मिली फूलपुर सीट, 2014 में 3 लाख वोटों से जीती थी भाजपा

0
295

फूलपुर लोकसभा सीट भाजपा के पास चार साल भी नहीं रही। देश को आजादी मिलने के बाद 1952 में पहली बार हुए आम चुनाव के 62 साल बाद भाजपा को 2014 में फूलपुर में जीत नसीब हुई थी। एक समय पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का निर्वाचन क्षेत्र रहे फूलपुर से केशव प्रसाद मौर्य ने 2014 में रिकार्ड 3.08 लाख मतों से जीत हासिल की थी।यह पहला मौका था जबकि भाजपा का कमल इस सीट से खिला था। उपचुनाव की सभाओं में निवर्तमान सांसद केशव प्रसाद मौर्य इस बात का जिक्र करना नहीं भूलते थे कि जितने मतों के अंतर से जवाहर लाल नेहरू कभी नहीं जीते उससे अधिक अंतर से जनता ने उन्हें जिताकर देश की सबसे बड़ी पंचायत में भेजा था।19 फरवरी को कौशलेन्द्र सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाये जाने के बाद उपमुख्यमंत्री लगातार इलाहाबाद में टिके रहे और संसदीय क्षेत्र का शायद ही कोई इलाका बचा होगा जहां उनकी सभा न हुई हो। फौरी तौर पर भाजपा की हार के पांच प्रमुख कारण दिखाई पड़ रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-भाजपा से नाराजगी
भाजपा के लिए यह उलटफेर कोई एक दिन में नहीं हुआ। इसकी पृष्ठभूमि लंबे समय से तैयार हो रही थी। उपमुख्यमंत्री और निवर्तमान सांसद केशव प्रसाद मौर्य उपचुनाव की सभाओं में लगातार अपने विकास कार्यों का हवाला देते हुए पार्टी प्रत्याशी के लिए वोट मांगते रहे। भाजपा के रोजगार देने का वादा पूरा न होना भी कारण है। सालभर में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड का गठन नहीं हो सका। बेसिक शिक्षा विभाग की हजारों पदों पर हो रही भर्तियां सालभर से रुकी हैं।
गठबंधन ने बिगाड़ा समीकरण
फूलपुर में सपा को बसपा के समर्थन ने भाजपा का समीकरण बिगाड़ दिया। भाजपा नेता प्रचार के दौरान भले ही खुलकर गठबंधन को नकारते रहे हों लेकिन उन्हें भी अंदर-अंदर सपा-बसपा के साथ आने का डर सता रहा था। यही कारण है कि भाजपा के यादव और पिछड़े नेताओं को प्रचार में आगे रखा गया। अपना दल (एस) की सर्वेसर्वा अनुप्रिया पटेल ने भी सभाएं कीं लेकिन मुस्लिम-यादव-दलित समीकरण ने भाजपा की गणित बिगाड़ दी। ये स्थिति तब है जबकि बसपा सुप्रीमो मायावती तो दूर उनका कोई कद्दावर नेता प्रचार के लिए नहीं आया। विश्लेषकों की मानें तो मायावती की रैली होती तो सपा की जीत का अंतर और बढ़ना तय था।
बाहरी प्रत्याशी, मतों का बिखराव व कम वोटिंग
उपचुनाव में हार के लिए भाजपा का प्रत्याशी बाहरी होना भी बड़ा कारण माना जा रहा है। पार्टी ने वाराणसी के पूर्व मेयर कौशलेन्द्र सिंह पटेल पर दांव लगाया था। कौशलेन्द्र मिर्जापुर के रहने वाले हैं। 19 फरवरी को उनके नाम की घोषणा होने तक जनता ने उनका नाम तक नहीं सुना था। कौशलेन्द्र सिंह को प्रचार के दौरान के पटेल के रूप में प्रोजेक्ट किया गया लेकिन पटेल मत भाजपा के पक्ष में एकजुट नहीं हुए। बाहरी-बनाम भीतरी की लड़ाई में भीतरी प्रत्याशी यानी सपा के नागेन्द्र प्रताप सिंह पटेल का पलड़ा भारी पड़ गया।
लोस उपचुनावः राज्यसभा चुनाव पर भी पड़ेगा सपा की जीत का असर!
ध्रुवीकरण का फायदा सपा को
सपा को अल्पसंख्यक मतों के ध्रुवीकरण का फायदा मिला। अतीक अहमद के निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरने के बाद कयास लगाया जा रहा था कि अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण पूर्व सांसद के पक्ष में होगा। लेकिन अल्पसंख्यक मतदाता सपा के पक्ष में एकजुट हो गए।
कम मतदान से हाथ से फिसल गई सीट
भाजपा की हार के लिए कम मतदान भी बड़ा कारण है। शहर उत्तरी और पश्चिमी में 2014 के आम चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव की अपेक्षा कम वोटिंग हुई। इसका नुकसान भी भाजपा को हुआ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.