दलित कार्ड से कांग्रेस के लिंगायत दांव को रोकेगी मोदी सरकार

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नई दिल्ली
चुनाव से पहले कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने भले ही सूबे के लिंगायत समुदाय को हिंदुओं से अलग धर्म का दर्जा देने की सिफारिश की हो, लेकिन केंद्र इसकी मंजूरी देने के मूड में नहीं है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक बुधवार को पीएम मोदी के नेतृत्व में हुई कैबिनेट में मीटिंग में मंत्रियों के बीच कांग्रेस के इस प्रस्ताव को लेकर चर्चा हुई। इस बैठक में ज्यादातर मंत्रियों ने यह कहते हुए लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने का विरोध किया कि इससे वीरशैव-लिंगायत समुदाय के दलितों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकेगा।
सूत्रों के मुताबिक मीटिंग में मौजूद केंद्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि फिलहाल हिंदू, बौद्ध और सिख समुदाय के दलितों को ही नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिलता है। ऐसे में वीरशैव-लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने पर दलित तबके के लोग आरक्षण से वंचित रह जाएंगे।
मीटिंग में मौजूद कर्नाटक से आने वाली सीनियर मिनिस्टर अनंत कुमार ने भी इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए सरकार को समझाया कि कैसे खुद यूपीए-2 ने ही इस मांग को खारिज कर दिया था। तब ऑल इंडिया वीरशैव महासभा ने लिंगायतों और वीरशैव-लिंगायतों को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने की मांग की थी। वहीं, गुरुवार को पासवान ने तो सार्वजनिक तौर पर कांग्रेस के इस प्रस्ताव का विरोध किया।
पासवान ने कहा, ‘लिंगायत समुदाय में भी दलित है। यदि लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा दिया जाता है तो उसमें मौजूद दलितों को अनुसूचित जाति का आरक्षण नहीं मिल सकेगा। सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध समुदाय के दलितों को ही आरक्षण का लाभ मिलता है। फिर इन लोगों के हितों का नुकसान क्यों किया जाए?’ दलित नेता और एनडीए के अहम सहयोगी का यह स्टैंड बताता है कि मोदी सरकार कांग्रेस के इस प्रस्ताव को किस तरह से ले रही है।
दक्षिणी राज्य कर्नाटक में कुछ ही दिनों में चुनाव होने हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि कांग्रेस ने सूबे की 18 फीसदी लिंगायत आबादी को अपनी ओर लुभाने के लिए यह दांव चला है। लिंगायत समुदाय को आमतौर पर बीजेपी का समर्थक माना जाता रहा है। राज्य में बीजेपी के सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा भी इसी समुदाय से आते हैं।

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