‘आखिरी चुनाव’ में सब दांव पर, शाह को टक्कर दे रहा है सिद्धारमैया का गणित

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बेंगलुरु
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में महज 45 दिन बाकी बचे हैं और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया एकमात्र फैक्टर हैं जो अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी को टक्कर देते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस सरकार वाले दो बड़े राज्यों में से एक कर्नाटक में अपनी सत्ता बचाए रखने की कोशिश कर रहे सिद्धारमैया अपने विधानसभा क्षेत्र और इसके आसपास के इलाकों में पांच दिन का दौरा करने जा रहे हैं।
कर्नाटक में अब तक बनी चुनावी रणनीति के बाद यह चुनाव सिद्धारमैया बनाम पीएम नरेंद्र मोदी हो गया है। सिद्धारमैया ने अपनी विधानसभा सीट बदलने का फैसला किया है और अब वह मैसूर में वरुणा के बजाय पास के चामुंडेश्वरी से चुनावी मैदान में उतरेंगे। उन्होंने कहा, ‘यह मेरा आखिरी चुनाव है और मैं इसे भावनात्मक कारणों के चलते अपनी पुरानी विधानसभा सीट पर लड़ना चाहता हूं जिसने मुझे पांच बार चुना है।’ सिद्धारमैया 2006 के उपचुनाव में महज 257 वोटों के अंतर से चामुंडेश्वरी से पहली बार कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीते थे। बीजेपी के नेताओं का कहना है कि वह इस बार भी चामुंडेश्वरी में किसी चमत्कार की उम्मीद में लड़ रहे हैं। जनता दल (एस) नेता एचडी कुमारास्वामी ने भी माना है कि यहां लड़ना सिद्धारमैया के लिए मुश्किल होने वाला है।
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बेटों में होगी आर-पार की लड़ाई
सिद्धारमैया यहां से अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं तब यहां से जीता जब कुमारास्वामी मुख्यमंत्री और बीएस येदियुरप्पा डेप्युटी सीएम थे। मैं यहां के हर वोटर को जानता हूं और मुझे भरोसा है कि वे मेरा समर्थन करेंगे।’ राजनीति में कदम रख रहे सिद्धारमैया के बेटे यतीन्द्र वरुणा से कांग्रेस के उम्मीदवार हो सकते हैं। माना जा रहा है बीजेपी भी सीएम के दूसरे चेहरे येदियुरप्पा के बेटे विजेंद्र को इस सीट पर उतारने की तैयारी कर रही है।जैन युनिवर्सिटी के वीसी संदीप शास्त्री का कहना है कि यह ‘सन स्ट्रोक’ सभी पार्टियों पर असर डालेगा। उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता है कि येदियुरप्पा अपने बेटे को पहले ही चुनाव में उस सीट पर उतारना चाहेंगे जहां कांग्रेस मजबूत है। हो सकता है यह सिर्फ अफवाह हो और इसका असर देखने के लिए रची गई कहानी है। अभी ऐसी और बातें आएंगी, जैसे यह भी कहा जा रहा है कि सिद्धारमैया चामुंडेश्वरी से लड़ने को लेकर दुविधा में हैं।’
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बीजेपी के वोट शेयर में सेंध
राजनीतिक एक्सपर्ट्स की मानें तो इन दोनों सीटों की पृष्ठभूमि से स्पष्ट है कि इनके परिणाम पूरे राज्य में होने वाली जीत-हार का आईना होंगे। वरुणा सीट में ही सुत्तूर मठ भी है जो लिंगायत समुदाय का प्रमुख मठ है, इस समुदाय से येदियुरप्पा भी आते हैं। इसके अलावा सिद्धारमैया ने वैदिक कर्मकांड करने वाले वीरशैव के अलावा बाकी समुदायों को भी अल्पसंख्यकों का दर्जा देने के संकेत देकर बीजेपी के मजबूत वोट बेस में भी सेंध लगाई है। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि इस कदम का असर कैसा पड़ने वाला है और बीजेपी या कांग्रेस में से किसे इसका लाभ मिलेगा।
विश्लेषकों का मानना है कि वीरशैव समुदाय के लोग अब भी संशय में हैं लेकिन उनकी संख्या कम है। इनके अलावा बाकी समुदाय अच्छी-खासी संख्या में हैं लेकिन स्पष्ट नहीं है कि वे किसे वोट करेंगे। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह तो पहले ही सिद्धारमैया को विभाजन करने वाला नेता कह चुके हैं। परिणाम कैसे भी हों लेकिन यह तो स्पष्ट है कि सिद्धारमैया ने जो राजनीतिक समीकरण तैयार किए हैं, वह बीजेपी के लिए इस चुनाव को कहीं ज्यादा मुश्किल बनाने वाले हैं।

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