सर्वे: मिड डे मील योजना सफल, स्कूलों में बढ़े बच्चे

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मिड-डे मील योजना अपने उद्देश्य में कामयाब होती दिख रही है। योजना पर हुए राष्ट्रीय पोषण संस्थान के अध्ययन में बच्चों ने कहा है कि खाना मिलने से उनका पढ़ाई में मन लगता है। अध्ययन में सामने आया कि खाने का स्वाद 87 फीसदी बच्चों को पसंद आ रहा है। वर्ष 2017-18 में 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 70 जिलों में किए गए अध्ययन के आधार पर ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार की गई है। इसमें 72 फीसदी बच्चों का कहना है कि मिड-डे मील की वजह से कक्षा में पढ़ाई को लेकर उनकी एकाग्रता बढ़ी है। गौरतलब है कि मिड डे मील योजना बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करने और बच्चों में पोषण का स्तर बढ़ाने के उद्देश्य के तहत शुरू की गई थी संस्थान ने इसकी ड्राफ्ट रिपोर्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंप दी है। वहीं, फाइनल रिपोर्ट इस महीने तैयार हो जाने की उम्मीद है।
स्कूल में ड्रॉप आउट में कमी
स्कूल जा रहे 92 फीसदी बच्चों को मिड-डे मील मिल रहा है। मिड-डे मील योजना स्कूल में उपस्थिति बढ़ाने के अपने मुख्य लक्ष्य में भी काफी हद तक कामयाब होती नजर आ रही है। अध्ययन के दौरान 92 फीसदी शिक्षकों और 80 फीसदी माता-पिता ने माना कि मिड-डे मील की वजह से स्कूलों में नामांकन और उपस्थिति बढ़ी है।
पोषण भी सुधरा
96 फीसदी शिक्षकों और 80 फीसदी माता-पिता ने माना कि मिड-डे मील ने बच्चों के पोषण स्तर में इजाफा किया है। हालांकि दोबारा मांगने पर 58 फीसदी बच्चों को ही खाना मिलता है।
अक्षय पात्र ने भी उदाहरण कायम किया
अक्षय पात्र फाउंडेशन एक गैर सरकारी संस्था है, जो सात राज्यों के 6500 स्कूलों में लगभग 12 लाख स्कूली छात्रों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराती है। इस संस्था का नाम दिसंबर 2009 में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। सरकार से इतर गरीब बच्चों को भोजन देने वाला यह सबसे बड़ा कार्यक्रम है। कर्नाटक से वर्ष 2000 में शुरू हुई यह योजना उत्तरप्रदेश, राजस्थान, उडीसा, गुजरात, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ में ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों को भोजन उपलब्ध करा रही है। मंदिरों, उद्यमियों और स्वयंसेवी संस्थाएं इसके लिए दान देती हैं।
सबसे बड़ी मध्यान्ह भोजन योजना
12.56 लाख स्कूलों में चलाई जा रही मिड-डे मील योजना मौजूदा समय में
12 करोड़ से अधिक भारतीय बच्चों के योजना से लाभान्वित होने का अनुमान
2.89 रुपये प्राइमरी और 4.33 रुपये उच्च प्राथमिक स्तर पर प्रति बच्चे मिलते हैं
10500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया योजना के लिए 2018 के बजट में
गुणवत्ता को लेकर कैग ने उठाए हैं सवाल
मिड डे मील से स्कूल में बच्चों की उपस्थिति तो सुधरी है, लेकिन भोजन की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं। कैग ने भी 2016 की अपनी जांच में पाया था कि अधिकतर विद्यालयों में रसोईघर, शैडो, बर्तन और पेयजल सुविधा का घोर अभाव है। दूषित भोजन से कई बार बच्चों के बीमार पड़ने की घटनाएं यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सामने आई हैं।
6 से 9 रुपये प्रति छात्र खर्च करती है सरकार मिड डे मील पर
भोजन की गुणवत्ता को लेकर पंचायत और स्कूल प्रबंधन लापरवाह
भोजन में मरी छिपकली से 87 बच्चे बीमार
पश्चिम बंगाल के एक गांव में 19 नवंबर 2017 को मिड-डे मील में मरी हुई छिपकली निकली थी। ऐसा दूषित खाना खाकर 87 बच्चे बीमार हो गए, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। यूपी के कई स्कूलों में बच्चों से खाना बनवाने की शिकायतें सामने आईं।
बिहार में 23 बच्चों की मौत
जुलाई 2013 में बिहार के सारण जिले में एक सरकारी विद्यालय में कीटनाशक पदार्थों से युक्त मध्याह्न भोजन खाने से तेईस बच्चों की मौत हुई थी।
61 बच्चे बीमार पड़े नाशिक के नगर निगम के एक स्कूल में 22 जनवरी 2011 को जहरीला भोजन खाने से
10 छात्राओं की हालत बिगड़ी 25 नवंबर 2009 को दिल्ली में त्रिलोकपुरी स्थित एक विद्यालय में विषाक्त खाना खाने से
08 छात्र बीमार पड़े 24 अगस्त 2009 को मध्यप्रदेश के सिवनी में एक सरकारी स्कूल में मध्याह्न भोजन करने से
60 छात्र बीमार पड़ गए 12 सितंबर 2008 को झारखंड के एक स्कूल में जहरीला भोजन करने से

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