सोशल मीडिया पर झूठे संदेश फैलाने वालों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि झूठे और विस्फोटक संदेश और वीडियो भेजने वालों के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 ए के तहत एफआईआर दर्ज हो। यह धारा दो समुदायों के बीच धार्मिक, जाति, जन्मस्थान और भाषा के आधार पर वैमनस्य फैलाने को लेकर है। देश में पीट-पीट कर मार डालने जैसी हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने दुख जताया है। सरकार तकनीक से वाली हिंसा से फैलने वाली हिंसा से निपटने के लिए प्रयास कर रही है लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से सरकार के लिए यह आसान हो गया है।
ऐसे मामलों के लिए हर जिले में विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे जिनमें रोजाना के आधार पर सुनवाई होगी। ट्रायल छह माह में पूरी किया जाएगा। यह निर्देश पहले से लंबित ऐसे मामलों पर लागू भी होगा। हर जिला जज ऐसे मामलों को एक विशेष जज को ही देंगे ताकि जल्द निपटारा हो। इस मामले में राज्य सरकार और नोडल अधिकारी की जिम्मदोरी होगी कि वह ट्रायल को तेजी से निपटाने में प्रभावी भूमिका अदा करे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर जिले में एक एसपी रैंक का अधिकारी नोडल अधिकारी होगा। डीएसपी उनकी सहायता करेंगे तथा वे सूचनाएं एकत्र करेंगे कि कहां अपराध करने को आतुर लोग एकत्र हो रहे हैं और झूठी खबरें व भड़काऊ भाषण फैला रहे हैं। नोडल अधिकारी हर माह स्थानीय खुफिया यूनिट के साथ बैठक करेंगे तथा सोशल मीडिया पर झूठे संदेशों को रोकने पर विचार करेंगे। केंद्र और राज्य सरकार की यह ड्यूटी होगी कि वे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर झूठे संदेशों और भड़काऊ वीडियो को रोकें। केंद्र सरकार समय-समय पर राज्यों को इस बारे में परामर्श जारी करेंगी। यदि भीड़ की हिंसा हो जाती है तो पुलिस शीघ्र एफआईआर दर्ज करेगी। एसएचओ तुरंत इसकी जानकारी नोडल अधिकारी को देंगे जो सुनिश्चित करेंगे कि पीड़ित परिवार को और नुकसान न हो सके। ऐसे मामलों की जांच नोडल अधिकारी खुद मॉनीटर करेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि अदालत में चार्जशीट समय पर दाखिल हो जाए। सरकार भीड़ तथा पीटने की हिंसा के पीड़ितों के लिए सीआरपीसी की धारा 357 ए के तहत मुआवजे की योजना एक माह में तैयार करेगी। इसमें चोट की प्रकृति, रोजगार का नुकसान और इलाज में आए खर्च को देखते हुए मुआवजा देगी। इसमें अंतरमि राहत का प्रावधान भी होगा जो पीड़ित को 30 दिन में मिल जाए। पीड़ित और मारे गए परिजनों के लोगों को लीगल सेवा अथॉरिटी एक्ट, 1987 के तहत मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकार होगा। पीड़ित पक्ष को अदालत समय से कार्यवाही का नोटिस देगी और अभियुक्त को जमानत, पेरोल देने या अन्य कार्यवाहियों में उसकी सुनवाई करेगी। उन्हें सजा, बरी होने के मामले में लिखित जवाब देने का अधिकार भी होगा।
जब भी यह समाने आएगा कि भीड़ की हिंसा रोकने, जांच करने या त्वरित ट्रायल करवाने में पुलिस प्रशासन इन निर्देशों के पालन में असफल रहा है तो इसे लापरवाही माना जाएगा। उनके खिलाफ छह माह के अंदर विभागीय कार्रवाही की जाएगी। अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही भी शुरू की जाएगी। सभी निर्देशों का चार हफ्ते के अंदर पालन सुनिश्चित किया जाएगा। इसके पालन की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में दाखिल की जाएगी।

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