दुनिया में ‘इबोला’ का कहर, शवयात्रा में शामिल लोगों को भी ले सकता है चपेट में

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इबोला का नाम सुनते ही दुनिया के कई मुल्‍कों के कान खड़े हो जाते हैं। कई अफ्रीकी मुल्‍कों में यह वायरस कहर बनकर टूटा है। अब भी यहां के कई मुल्‍क इसकी चपेट में हैं। यह एक ऐसा खतरनाक वायरस है कि संक्रमित शव के साथ चल रहे लोगों को भी अपनी चपेट में ले सकता है। आइए जानते हैं कि इस वायरस के लक्षण। क्‍या है इससे बचने के उपाय ? साथ ही इस वायरस से निपटने के लिए क्‍या है अफ्रीका के इन मुल्‍कों के समक्ष बड़ी चुनौती ?

दरअसल, इन दिनों अफ्रीका के कई मुल्‍क दो तरह की समस्‍याओं से जूझ रहे हैं। पहले, तो गृहयुद्ध से निपटने में उन्‍होंने अपनी सारी ताकत झोंक दी है। दूसरी ओर इबोला वायरल ने देश में अपना तांडव मचा रखा है। यहां सबसे बड़ी मुश्किल यह आ रही है कि विद्रोहियों के चलते वायरल की चपेट में आए रोगियों को मदद नहीं मिल पा रही है। इसमें एक प्रमुख राष्‍ट्र कांगो लोकतांत्रिक गणराज्‍य है। यहां रविवार को राष्‍ट्रपति चुनाव को देखते हुए स्थितियां और जटिल हो गई हैं। यहां अब तक इस वायरल की चपेट में आकर 319 लोगों की मौत हाे चुकी है। कांगो सरकार ने लोगों को चेतावनी दी है कि यह वायरस यहां करीब चार महीने तक और सक्रिय रहेगा। क्रिसमस को देखते हुए आंशका जाहिर की जा रही है कि यह दुनिया के अन्‍य मुल्‍कों में भी फैल सकता है। इसके मद्देनजर विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने भी लोगों को आगाह किया है।

इस बीच क्रिसमस पर्व को देखते हुए अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि उत्सव की अवधि के दौरान हजारों परिवार सीमा पर यात्रा करने और भोजन खरीदने के लिए यात्रा करेंगे। इबोला को युगांडा में प्रवेश से रोकने के प्रयास के लिए कई कदम उठाए गए हैं। युगांडा के स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी सैमुअल कासिम्बा ने कहा है कि यह प्रकोप युगांडा के करीब आ रहा है। उधर, विद्रोही हमले वाले क्षेत्रों यानी रेड जाेन के इलाकों में राहत कार्य करीब-करीब बाधित है। कई राहतकर्मी इन विद्रोहियों का शिकार हो चुके हैं। अब तक यहां एक हजार से ज्‍यादा लोग मारे जा चुके हैं।

चार वर्ष पूर्व भारत में मिला था एक मरीज
वर्ष 2014 में लाइबेरिया से आए एक युवक में इबोला वायरस पाया गया था । हालांकि, उसे दिल्‍ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर ही रोक लिया गया। भारत में इबोला का यह पहला केस था। इबोला एक संक्रमण की बीमारी है, जो छूने से फैलती है। इसलिए भारत में ये काफी घातक साबित हो सकता है। यहां आबादी काफ़ी ज्यादा और सघन है, ऐसे में इबोला के मामले बढ़े तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।

जानलेवा इबोला की पहचान

1976 में वैज्ञानिकाें ने इबोला वायरस की पहली बार पहचान की। इस जानलेवा वायरस के आगे दुनिया के सभी खतरनाक वायरस बौने साबित हुए। यह वायरस अब तक पूरे विश्व में 11,000 लोगों की जान ले चुका है।
इबोला की पुष्टि करने से पहले गिनी में स्वास्थ्य अधिकारियों ने देश के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में एक रहस्यमय बग की सूचना दी थी। शुरुआत में नाइजीरिया, माली और अमेरिका ने भी इबोला वायरस की दस्‍तक और उससे होने वाली मौतों की सूचनाएं दी थीं। लेकिन ये बहुत छोटे पैमाने पर थी। तीन देशों के बीच कुल 15 घातक हमले हुए थे।

इबाेला के लक्ष्‍ण

दरअसल, इबोला एक रक्तस्रावी बुखार है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस वायरस की संक्रमण गति इतनी तीव्र है कि यह दो वर्ष की अवधि में पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकता है। यह इतना घातक है कि पूरे पश्चिमी अफ्रीका को नष्ट कर सकता है।
मनुष्यों में इसका संक्रमण संक्रमित जानवरों, जैसे, चिंपैंजी, चमगादड़ और हिरण आदि के सीधे संपर्क में आने से होता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार इबोला एक क़िस्म की वायरल बीमारी है।
अचानक बुख़ार, कमज़ोरी, मांसपेशियों में दर्द और गले में ख़राश इसके शुरुआती लक्षण हैं। ये लक्षण बीमारी की शुरुआत भर होते हैं। इसका अगला चरण है उल्टी होना, डायरिया और कुछ मामलों में अंदरूनी और बाहरी रक्तस्राव भी होता है।

यह मनुष्यों के अंदर रक्त, स्राव और लोगों के अन्य शारीरिक तरल पदार्थ के माध्यम से प्रेषित किया जा सकता है, जो संक्रमित हो गए हैं। एक दूसरे के बीच इसका संक्रमण संक्रमित रक्त, द्रव या अंगों के मार्फ़त होता है। यहां तक कि इबोला के शिकार व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी ख़तरे से ख़ाली नहीं होता। शव को छूने से भी इसका संक्रमण हो सकता है।
बिना सावधानी के इलाज करने वाले चिकित्सकों को भी इससे संक्रमित होने का भारी ख़तरा रहता है।
संक्रमण के चरम तक पहुंचने में दो दिन से लेकर तीन सप्ताह तक का वक़्त लग सकता है और इसकी पहचान और भी मुश्किल है।
इससे संक्रमित व्यक्ति के ठीक हो जाने के सात सप्ताह तक संक्रमण का ख़तरा बना रहता है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़, उष्णकटिबंधीय बरसाती जंगलों वाले मध्य और पश्चिम अफ़्रीका के दूरदराज़ गांवों में यह बीमारी फैली। पूर्वी अफ़्रीका की ओर कांगो, युगांडा और सूडान में भी इसका प्रसार हो रहा है।
साथ ही साझा तौलिये के इस्तेमाल से बचना चाहिए क्योंकि यह सार्वजनिक स्थलों पर संक्रमित हो सकता है।

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन का दावा

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक ताजा विश्लेषण में यह दावा किया गया है गिनी में पहली बार इस वायरस की पहचान की गई। गिनी अफ्रीका के लाइबेरिया और सियरा लियोन का पड़ोसी देश है। बाद में इस वायरस ने लाइबेरिया और सिएरा लियोन में अपने पांव पसारा। लाइबेरिया को विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा इबोला-मुक्त राज्‍य घोषित किया गया, लेकिन इस महामारी को आधिकारिक तौर पर जनवरी, 2016 में पुन: वापसी की।

दरअसल, 2003 में यहां गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद सर्वाधिक मौतें इस बुखार से हुई थी। एक अनुमान के मुताबिक करीब चालीस फीसद मौत की वजह यह वायरस बना। सिएरा लियोन ने सबसे अधिक संख्या में इबोला मामलों की सूचना दी थी।इस देश के अधिकतर नागरिक इस वायरस की चपेट में थे।

देश मामले मौत

गिनी 3814 2544

सियरा लिओन 14,124 3956

लाइबेरिया 10,678 4,810

नाइजीरिया 20 08

सेनेगल 01 0 0

स्पेन 01 00

अमेरिका 04 1

माली 08 06

यूके 01 00

इटली 01 00

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