रांची. झारखंड गठन के बाद से टीवीएनएल को लेकर झारखंड-बिहार के बीच चला रहा विवाद समाप्ति के कगार पर है। झारखंड का प्रस्ताव बिहार कैबिनेट से पास होने के बाद अब झारखंड कैबिनेट में आएगा। यहां से मंजूर होने के बाद दोनों सरकारों की ओर से आपसी सहमति पत्र सुप्रीम कोर्ट में सौंपा जाएगा। इसके बाद हमेशा के लिए यह विवाद समाप्त हो जाएगा। दो सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट में इस पर सुनवाई होनी है।

बिहार कैबिनेट ने झारखंड सरकार की शर्तों को मान लिया है। बिहार सरकार का सहमति पत्र भी झारखंड ऊर्जा विभाग को मिल चुका है। फिलहाल, टीवीएनएल में 210-210 मेगावाॅट की दो यूनिटें हैं, आगे इनका विस्तार करके 660-660 मेगावाॅट की दो और यूनिटें लगानी हैं। बिहार के ऊर्जा सचिव प्रत्यय अमृत ने पिछले साल 17 सितंबर को झारखंड ऊर्जा विभाग को पत्र लिखा था, जिसमें उनसे वर्तमान एवं भविष्य में यहां से उत्पादित बिजली का 40 प्रतिशत हिस्सा मांगा था।

इसके जवाब में दिसंबर में ऊर्जा विभाग ने बिहार के ऊर्जा विभाग को पत्र भेजा था। कहा था कि टीवीएनएल बोर्ड के निर्णय के अनुसार, वर्तमान यूनिटों से बिहार को 40 प्रतिशत बिजली देना असंभव है। मगर, इसके विस्तार के बाद बिजली दी जा सकती है। बिहार के समक्ष एक और शर्त रखी गई थी कि बिजली लेने के लिए उसे खुद ट्रांसमिशन लाइन बिछानी होगी। झारखंड बिजली नियामक आयोग द्वारा तय दर पर बिहार को बिजली दी जाएगी। इसके लिए बिहार को एस्क्रो खाता खोलना होगा, जिसमें बिहार की ओर से कोई भुगतान नहीं करने की स्थिति में समझौते की शर्तों पर झारखंड कार्रवाई करेगा। इन सभी शर्तों को बिहार सरकार ने मान लिया।

प्रक्रिया में लगेंगे दो से तीन माह
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों को सलाह दिया था कि यह इनका आपसी मसला है। इसलिए, कोर्ट के बाहर सुलझाकर इसकी जानकारी कोर्ट दें। अब चूंकि दोनों स्टेट के बीच सहमति बन गई है। बिहार कैबिनेट ने मंजूर कर लिया है, तो झारखंड कैबिनेट से इसे पास कर ज्वाइंटली कोर्ट में हलफनामा दायर करना होगा। इस प्रक्रिया को पूरी करने में दो से तीन माह लग सकते हैं। कोर्ट से निर्णय आने के बाद दोनों स्टेट को पुन: पावर परचेज एग्रीमेंट करना होगा।

अभी इसे बिहार कैबिनेट ने मंजूर किया है। झारखंड कैबिनेट से भी इसे पास कराना होगा। इसके बाद संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करना होगा। फिर बिहार के साथ पावर परचेज एग्रीमेंट होगा। इस पूरी प्रक्रिया में दो से तीन माह लगेंगे। इसके बाद ही पूर्ण रूप से इस समझौते को मान्य समझा जाएगा।’

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