टोरंटो,धरती के विशालतम जीव डायनासोर को विलुप्त हुए भले ही लंबा अरसा बीत गया हो, लेकिन वे आज भी वैज्ञानिकों से लेकर आम इंसानों तक के लिए कौतुहल का विषय बने हुए हैं। इस जीव की उत्पत्ति से लेकर इसके अंत तक को जानने के संबंध में दुनियाभर के वैज्ञानिक कई अध्ययन कर चुके हैं, इसके बावजूद इनकी उत्पत्ति, विकास और अंत के सटीक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसी दिशा में वैज्ञानिकों को एक उम्मीद की किरण दिखाई दी है। उनका मानना है कि इस जीव के प्राचीनतम अंडों की मदद से इसकी उत्पत्ति और विकास क्रम की गुत्थी को सुलझाने में मदद मिल सकती है।

दरअसल, वैज्ञानिकों ने विश्व में डायनासोर के सबसे प्राचीन ज्ञात अंडों की मदद से इस जीव की उत्पत्ति से जुड़ी कई नई जानकारियां एकत्र की हैं। इन अंडों की जांच के बाद वैज्ञानिकों का मानना है कि इनके जरिये इस जीव के बारे में वो सब पता चल सकता है, जिनसे दुनिया अब तक अंजान है।

इतने पुराने हैं ये अंडे

कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो मिसिसॉगा के शोधकर्ताओं ने अर्जेंटीना, चीन और दक्षिण अफ्रीका में खोजे गए स्थानों पर इन अंडों व अंडे के छिलकों के जीवाश्म अवशेषों का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं का कहना है कि 19.5 करोड़ साल पुराने ये अंडे जीवाश्म रिकॉर्ड में ज्ञात सबसे प्राचीन अंडे हैं। ये सभी अंडे सॉरोपॉड्स ने दिए थे। बता दें कि सॉरोपोड्स चार से आठ मीटर लंबे तथा लंबी गर्दन वाले शाकाहारी जीव थे और अपने समय के सबसे आम एवं दूर-दूर तक पाए जाने वाले डायनासोर थे। इनके निशान कई देशों में पाए गए हैं।

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अभी छिपे हैं कई रहस्य

टोरंटो यूनिवर्सिटी के रॉबर्ट रीस्ज के मुताबिक, जीवाश्म रिकॉर्ड में रेंगने वाले एवं स्तनपायी परभक्षियों के 31.6 करोड़ साल पुराने कंकाल मौजूद हैं, लेकिन 12 करोड़ साल बाद तक भी उनके अंडों एवं अंडों के खोलों के बारे में हम कुछ भी नहीं जानते हैं। रीस्ज कहते हैं, ‘यह बड़ा रहस्य है कि ये अंडे अचानक से इस समय नजर आए हैं और इससे पहले नहीं दिखे थे।’ फिलहाल रीस्ज और उनका दल इन अंडों और उनके छिलकों का गहनता से अध्ययन कर रहा है ताकि इस जीव के अनजाने रहस्यों पर से पर्दा उठाने में मदद मिल सके।

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यह मिलेगी मदद

बेल्जियम की घेंट यूनिवर्सिटी के एक अनुसंधानकर्ता कोइन स्टेन के मुताबिक, ये अंडे डायनासोरों में प्रजनन प्रक्रिया के क्रमिक विकास का पता लगाने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकते हैं। वह कहते हैं, हम जानते हैं कि इस जीव के अंडे सख्त होते थे, लेकिन अति प्राचीन होने के कारण इन जीवाश्म के अवशेषों में दरारें आ चुकी हैं। हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई है कि इन दरारों का असर उनके अध्ययन के परिणामों पर नहीं पड़ेगा।

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