25 जून 1975: आपातकाल के 44 साल, स्वतंत्र भारत का सबसे विवादित दिन, जानें इंदिरा ने कैसे लगाई इमरजेंसी?

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नई दिल्लीइतिहास में 25 जून का दिन भारत के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटना का गवाह रहा है. आज ही के दिन 1975 में देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तरफ से आपातकाल लगाने की घोषणा की गई, जिसने कई ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म दिया. तब इंदिरा ने सरकार और सत्ता के खिलाफ खड़े होने वाले हज़ारों लोगों को जेल में डाल दिया गया था. 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक की 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल था.

आपातकाल में लोकसभा चुनाव भी स्थगित हो गए थे

तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान के अनुचछेद 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी. स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादस्पद काल था. आपातकाल में लोकसभा चुनाव भी स्थगित हो गए थे.

इंदिरा शासन के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई जैसे नेताओं और सरकार के प्रति तीखी आलोचना करने वाले पत्रकारों, समाजसेवियों, नागरिक संगठनों के लोग और छात्रों को आपातकाल के वक्त सलाखों के पीछे भेज दिया गया था. अखबारों को सरकार के खिलाफ छापने से मना कर दिया गया और जो भी लिखा जाता था उसकी सेंसरशिप की जाने लगी. बताया जाता है कि अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सत्ता खोने के डर की वजह से इंदिरा गांधी ने देश में अपातकाल लागू किया था. जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, राजनारायण जैसे कई नेता इंदिरा गांधी की नीतियों के मुखर विरोधी थे.

अपातकाल के संदर्भ में कैथरीन फ्रैंक की किताब “इंदिरा: द लाईफ ऑफ इंदिरा नेहरु गांधी” का कुछ अंश हम यहां पेश कर रहे हैं.

25 जून की सुबह को पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे के पास इंदिरा गांधी के सचिव आरके धवन का फोन जाता है. आमतौर पर सिद्धार्थ शंकर रे कलकत्ता के बजाय दिल्ली में ही रहते थे. धवन ने रे से कहा कि वे जल्दी से प्रधानमंत्री आवास पर पहुचें.

उस समय प्रधानमंत्री आवास 1 सफदरजंग रोड हुआ करता था. सिद्धार्थ शंकर रे तुरंत जा कर इंदिरा गांधी से मिलते हैं और लगभग दो घंटे लगातार दोनों की बात चलती है. इंदिरा ने रे से कहा कि उन्हें ऐसा लगता है कि देश में अराजक माहौल आने वाला है. हम एक बहुत बड़ी समस्या में हैं और इससे निपटने लिए कोई बड़ा कदम उठाना होगा.

इंदिरा ने कहा कि गुजरात विधानसभा भंग कर दी गई है. बिहार विधानसभा भंग हो गई है. इसका कोई अंत नहीं है. लोकतंत्र खतरे में है. इंदिरा ने इस बात को दोहराया कि कुछ “कठोर, जरुरी कार्रवाई की जरूरत है.” इंदिरा गांधी को इंटेलिजेंस एजेंसियों के जरिए लगातार ये जानकारी दी जा रही थी कि देश के किस कोने में कौन सा नेता उनके खिलाफ रैली कर रहा है. उस दिन इंदिरा ने रे के सामने जयप्रकाश नारायण के एक रैली, जो कि शाम में होने वाली थी, का जिक्र करते हुए कहा कि वे अपने रैली से पुलिस और आर्मी को हथियार छोड़ने की बात करने वाले हैं.

“जब एक बच्चा पैदा होता है तो ये देखने के लिए कि बच्चा ठीक है या नहीं, हम उसे हिलाते हैं. भारत को भी इसी तरह हिलाने की जरूरत है.”

वहीं दूसरी तरफ इंदिरा गांधी को अमेरिकन इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए से भी खतरा था. इंदिरा को पता था कि वे पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की हेट लिस्ट में हैं. इंदिरा को ये डर सता रहा था कि उन्हें चिली के साल्वाडोर अलेंडे की तरह सत्ता से बेदखल कर दिया जाएगा. 1973 में सीआईए ने जनरल ऑगस्तो पिनोशेट की मदद से साल्वाडोर अलेंडे को सत्ता से उखाड़ फेंका था.

इंदिरा व्यक्तिगत रूप से डर रहीं थीं. उन्हें लगता था कि अगर जयप्रकाश नारायण उनके खिलाफ लोगों को खड़ा करने में कामयाब हो गए तो ये देश के लिए विध्वंसक होगा. इंदिरा को लगता था कि अगर वे सत्ता छोड़ती हैं तो भारत बर्बाद हो जाएगा. इंदिरा ने सिद्धार्थ शंकर रे से कहा, “जब एक बच्चा पैदा होता है तो ये देखने के लिए कि बच्चा ठीक है या नहीं, हम उसे हिलाते हैं. भारत को भी इसी तरह हिलाने की जरूरत है.” बाद में एक इंटरव्यू में इंदिरा ने कहा था कि देश को बचाए रखने के लिए ‘शॉक ट्रीटमेंट’ की जरूरत थी.

इंदिरा ने रे को इसलिए बुलाया था क्योंकि वे संवैधानिक मामलों के जानकार थे. हालांकि उस दिन इंदिरा गांधी ने कानून मंत्री एचआर गोखले से कोई सलाह नहीं ली थी. दरअसल उस समय इंदिरा गांधी कोई सलाह नहीं लेना चाहती थीं. उन्हें अपने फैसले को लेकर इजाजत की जरूरत थी.

गिरफ्तारी की लिस्ट में सबसे ऊपर थे जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई

इस मामले में एक दिन पहले ही संजय गांधी, गृह मंत्रालय के दूसरे सबसे प्रभावशाली व्यक्ति ओम मेहता और हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल ने इसकी शुरूआत कर दी थी. इतना ही नहीं सिद्धार्थ शंकर रे के बुलाने से पहले ही ये तीनों लोग आरके धवन के ऑफिस में ऐसे लोगों की लिस्ट तैयार कर रहे थे जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था. इस लिस्ट में सबसे उपर जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई थे.

सिद्धार्थ शंकर रे ही वो शख्स थे जिन्होंने राजनारायण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद इंदिरा गांधी से कहा था कि वो इस्तीफा न दें. रे कानूनी मामलों के बड़े जानकार थे लेकिन रे संजय गांधी के करीबी भी थे. उस दिन जब इंदिरा ने रे से पूछा कि हमें क्या करना चाहिए. उन्होंने कहा कि मुझे संवैधानिक स्थिति को देखना पड़ेगा. इसके बाद रे वहां से चले जाते हैं और भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका के संविधान को पढ़ने में घंटों समय बिताते हैं. इसके बाद वो इंदिरा के घर पर शाम 3.30 बजे आए और उन्होंने इंदिरा गांधी को बताया कि संविधाने के अनुच्छेद 352 के तहत देश में इमरजेंसी लगाई जा सकती है.

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