राहुल गांधी के इस्तीफे के 50 दिन पूरे, कांग्रेस में बिन गांधी सब सून

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नई दिल्लीः कांग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे की पेशकश को 50 दिन पूरे हो चुके हैं. लोकसभा चुनाव में करारी हार के कारण उन्होंने 25 मई को कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में इस्तीफा दिया था. पचास दिन बाद भी ना तो नए अध्यक्ष को लेकर तस्वीर साफ हो पाई है ना ही नए अध्यक्ष के चयन के लिए होने वाली कांगेस वर्किंग कमिटी की बैठक की तारीख तय हो पा रही है. आलम ये है कि इन पचास दिनों में जहां राहुल का इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है वहीं राहुल गांधी ने ना केवल अपना इस्तीफा सार्वजनिक कर दिया है बल्कि ट्विटर पर अपने परिचय से ‘कांग्रेस अध्यक्ष’ भी हटा चुके हैं. इन सब के बीच ‘नेतृत्व विहीन’ कांग्रेस को राज्य-दर-राज्य झटके लग रहे हैं.

कर्नाटक का ‘नाटक’ खत्म होने के बाद होगी सीडब्ल्यूसी:-
कांग्रेस वर्किंग कमिटी को ही इस बात का अधिकार है कि वो नए कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी का उत्तराधिकारी चुने. लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता काफी विचार-विमर्श के बावजूद किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहे हैं. सूत्रों से मिली ताजा जानकारी के मुताबिक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सीडब्ल्यूसी सदस्यों से संभावित नामों पर रायशुमारी कर रहे हैं.

कर्नाटक के सियासी संकट ने नए कांगेस अध्यक्ष के लिए अंदरखाने चल रही बैठकों पर फौरी तौर पर विराम लगा दिया है. इसकी वजह ये भी है कि पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के पास कर्नाटक का भी प्रभार है और वो बेंगलुरू में कैंप किए हुए हैं. माना जा रहा है कि कर्नाटक का मामला थमने के बाद ही सीडब्ल्यूसी की बैठक का रास्ता खुलेगा.

कोई दलित चेहरा होगा अगला कांग्रेस अध्यक्ष?
संभावित नामों की बात करें तो कांग्रेस पार्टी के गलियारों में नए अध्यक्ष के तौर पर महासचिव मुकुल वासनिक और मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम को लेकर सबसे ज्यादा कयास लगाए जा रहे हैं. वासनिक एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं और इन्हें संगठन का जबरदस्त अनुभव है. कुमारी शैलजा का नाम भी चर्चा में है. तीनों नेता दलित समाज से आते हैं. शुरुआत से अशोक गहलोत के नाम की संभावना भी जताई जाती रही है. कुछ युवा नेता सचिन पायलट को पार्टी की कमान सौंपना चाहते हैं.

पार्टी को चुकानी पड़ रही है कीमत :-
बीते पचास दिनों में इस्तीफे के बावजूद राहुल ने चुनावी राज्यों के नेताओं से मुलाकात की. महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में नए प्रदेश अध्यक्ष भी नियुक्त किए. लेकिन केंद्रीय नेतृत्व की लगाम ढीली होने के बाद कई प्रदेशों में कांग्रेस पहले से कमजोर हुई है. कर्नाटक में दर्जन भर विधायक बागी बन कर इस्तीफा दे चुके हैं तो तेलंगाना और गोवा में दो-तिहाई विधायकों ने रातों-रात पाला बदल लिया है. जिन राज्यों में जल्द विधानसभा चुनाव होने हैं वहां पर नेता खुल कर आमने-सामने हैं और ये खींचतान पार्टी को भारी पड़ रही है.

दिल्ली में प्रदेश अध्यक्ष शीला दीक्षित और प्रभारी पीसी चाको के बीच बात पूरी तरह बिगड़ चुकी है. शीला दीक्षित के फैसलों पर चाको रोक लगा रहे हैं वहीं तीनों कार्यकारी अध्यक्ष और दिल्ली कांग्रेस का एक बड़ा तबका शीला पर मनमानी करने का आरोप लगा रहे हैं.

हरियाणा में भी प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर द्वारा बनाई गई एक चुनाव समिति को प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने रद्द कर दिया. हरियाणा में हुड्डा बनाम तंवर की गुटबाजी तो पहले से ही जगजाहिर है.

महाराष्ट्र में कांग्रेस ने अशोक चव्हाण की जगह बालासाहेब थोराट को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के साथ चुनाव समितियों का भी एलान कर दिया है. लेकिन मुंबई कांग्रेस में मिलिंद देवड़ा और संजय निरुपम में छत्तीस का आंकड़ा बरकरार है. मिलिंद ने इस्तीफा दे कर केंद्रीय स्तर पर आने की बात की तो निरूपम ने इसका सरेआम मजाक उड़ाया.

झारखंड में नतीजों की समीक्षा बैठक में प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार और प्रभारी आरपीएन सिंह को कार्यकर्ताओं की भारी नाराजगी झेलनी पड़ी. बाकी चुनावी राज्यों के नेताओं से राहुल मिले भी लेकिन झारखंड के नेताओं से उनकी मुलाकात नहीं हुई. वैसे भी झारखंड में कांग्रेस झारखंड मुक्ति मोर्चा के भरोसे है.

जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है वहां भी सब ठीक नहीं है. पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के मंत्रिमंडल से इस्तीफे का एलान कर साफ कर दिया है कि वो कैप्टन के आगे नहीं झुकेंगे. कैप्टन खेमे ने सिद्धू के इस्तीफे को ‘ड्रामा’ करार दिया.

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की गुटबाजी खत्म होने का नाम नहीं ले रही. सचिन चाहते हैं कि लोकसभा चुनाव में बेहद खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेते हुए गहलोत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दें.

मध्यप्रदेश में नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए होड़ लगी है. गुजरात में भी प्रदेश अध्यक्ष और नेता विपक्ष के बीच गुटबाजी है. कुल मिलाकर इन हालातों से तमाम राज्यों में कांग्रेस की स्थिति दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है और स्थिति ठीक करने के लिए केंद्रीय स्तर से कोई पहल भी नजर नहीं आ रही क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व को लेकर असमंजस पचास दिनों से बरकरार है.

देरी पर अंदर से उठे सवाल :-
यही वजह है कि कर्ण सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं को बयान देना पड़ रहा है कि जल्द सीडब्ल्यूसी की बैठक बुला कर नए अध्यक्ष की घोषणा हो. लेकिन पचास दिनों के बाद भी स्थिति जस की तस है. पार्टी राहुल का उत्तराधिकारी नहीं चुन पा रही. वरिष्ठ नेता इस मुद्दे पर कोई संकेत तक नहीं दे पा रहे हैं. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने एबीपी न्यूज से कहा कि राहुल गांधी का कोई विकल्प नहीं है.

युवा बनाम अनुभव का द्वंद:-
पार्टी में नेता युवा चेहरा बनाम सांगठनिक अनुभव के बीच दुविधा है. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने किसी युवा को अध्यक्ष बनाने की मांग की है. पार्टी के वरिष्ठ नेता किसी अनुभवी को अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाना चाहते हैं. इस बीच अनौपचारिक तौर पर कुछ नेताओं की बैठक पर पार्टी के पूर्व महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने सवाल खड़े कर दिए और कहा कि नए अध्यक्ष के चयन के लिए राहुल गांधी को व्यवस्था बनानी चाहिए थी.

राहुल लड़ेंगे ‘विचारधारा की लड़ाई’ :-
राहुल ने खुद को इस प्रक्रिया से दूर रखने का एलान किया हुआ है. राहुल को मनाने के लिए पिछले दिनों में प्रदर्शन, धरने और इस्तीफे हुए. पार्टी के मुख्यामंत्रियों ने दिल्ली आकर राहुल को समझाया लेकिन राहुल टस से मस नहीं हुए. राहुल के करीबी सूत्रों का कहना है कि ‘विचारधारा की लड़ाई’ के उनके संकल्प के मद्देनजर उनके आगे के कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई जा रही है. लेकिन राहुल जिस हथियार (कांग्रेस पार्टी) की बदौलत वो ये लड़ाई लड़ पाएंगे उसी में धीरे-धीरे ‘जंग’ लग रही है. आशंका जताई जा रही है कि गांधी परिवार के नेतृत्व के अभाव में पार्टी में अराजकता आ सकती है. इसके संकेत साफ दिखने लगे हैं. कुल मिलाकर कांग्रेस में बिन गांधी सब सून जैसी स्थिति है.

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