सरकार के विधेयकों पर बिखरा रहा विपक्ष

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नई दिल्ली, संसद ने लोकसभा चुनाव के बाद अपने पहले सत्र में न केवल 67 वर्षों में सर्वाधिक विधेयक पारित करने का रिकॉर्ड बनाया, बल्कि यह भी देखा गया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने प्रमुख विधेयकों जैसे अनुच्छेद 370 को खत्म कराने, जम्मू एवं कश्मीर का पुनर्गठन, तीन तलाक और आरटीआई विधेयक को पारित कराने के लिए विपक्षी एकता किस तरह से तोड़ी।

यह कैसे हुआ, यह आश्चर्य का विषय है, क्योंकि विपक्षी पार्टियां जिन्होंने हाल ही में संपन्न हुए 17वें लोकसभा चुनाव में कई मोचरें पर एकता प्रदर्शित की थी, संसद में भाजपा के खिलाफ समान एकता बनाए रखने में विफल रहीं। नतीजा यह हुआ कि भाजपा, जो 303 सीटों के साथ लोकसभा में बहुमत में है, उसने प्रमुख विधेयकों को पारित कराने में विपक्षी खेमे को आसानी से तोड़ दिया। इन विधेयकों में से कुछ लंबे समय से लंबित थे, तो कुछ हाल ही में पेश किए गए थे।

सत्र की शुरुआत में विपक्ष एकजुट दिखाई दिया, लेकिन इसे बनाए रखने में विफल रहा।

कुछ विपक्षी दलों ने समर्थन किया और कुछ ने चर्चा में भाग नहीं लिया और जब भाजपा ने इन विधेयकों को पेश किया तो वे लोकसभा से बहिर्गमन कर गए। 52 सांसदों वाली कांग्रेस (यह संख्यात्मक दृष्टि से मुख्य विपक्षी पार्टी है) ने सरकार से भिड़ने की पूरी कोशिश की, लेकिन सत्ता पक्ष को आसानी से विधेयकों को पारित करने से नहीं रोक सकी।

मुख्य विपक्ष की हार और उसमें मतभेद तब देखा गया, जब केंद्र सोमवार को अनुच्छेद 370 को खत्म करने का संकल्प लेकर आया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के लिए एक विधेयक पेश किया। जम्मू एवं कश्मीर एक विधानसभा के साथ और लद्दाख विधानसभा बगैर।

सदन में भाजपा की 303 की ताकत प्रस्तावित कानून लाने के लिए पर्याप्त थी। लेकिन, इसने यह भी दिखाया कि विपक्ष में कैसे इस मुद्दे पर फूट पड़ गई।

इस कदम को बहुजन समाज पार्टी (बसपा), आम आदमी पार्टी (आप), बीजू जनता दल (बीजद), वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) ने समर्थन दिया था। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने यह कहते हुए लोकसभा से बहिर्गमन कर दिया कि वह विधेयक की चर्चा का हिस्सा नहीं बनना चाहती।

राजग का सहयोगी होने के बावजूद जनता दल(यूनाइटेड) ने कहा कि वह सरकार के कश्मीर प्रावधानों का समर्थन नहीं करेगी और विधेयक पर चर्चा में भाग लेने के बाद उसने लोकसभा से बहिर्गमन कर दिया। हालांकि, बाद में इसने सरकार के साथ अपनी एकता दिखाई, जब पाकिस्तान ने अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू एवं कश्मीर को प्रदत्त विशेष दर्जे को समाप्त करने के लिए भारत के साथ राजनयिक संबंधों को डाउनग्रेड कर दिया।

जद(यू) के प्रवक्ता व महासचिव के.सी. त्यागी ने कहा, “पाकिस्तान लंबे समय से भारत में आतंकवाद को प्रायोजित कर रहा है। हमारे सुरक्षा बलों ने कई बार उनकी योजनाओं को नाकाम किया है और उन्हें करारा जवाब दिया है।”

त्यागी ने आगे कहा, “लेकिन अब उन्होंने अनुच्छेद 370 पर एक नई रणनीति अपनाई है, जो पाकिस्तान की हताशा को दर्शाता है, क्योंकि इसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर समर्थन नहीं मिल रहा है।”

राजग के घटक शिवसेना, अन्नाद्रमुक और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) ने सरकार के उस कदम का समर्थन किया, जिसका कांग्रेस ने कड़ा विरोध किया था।

भाजपा पर ‘वोट बैंक के लिए’ निर्णय लेने और भारत के संवैधानिक इतिहास में सरकार के कदम को ‘काला दिन’ घोषित करने के आरोप के बावजूद, वे इस बात पर संतोषजनक तर्क नहीं दे सके कि अनुच्छेद 370 जम्मू एवं कश्मीर के लोगों के लिए कैसे लाभकारी था। 

विवाद के बावजूद, अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जे को रद्द करने के संकल्प, और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने से संबंधित विधेयक को पारित होने में महज सात घंटे से थोड़ा ही अधिक समय लगा। 

विपक्ष में इसी तरह की फूट तब देखी गई, जब सरकार ने तीन तलाक प्रथा के अपराधीकरण के लिए तीन तलाक विधेयक पेश किया। मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक पर संसद के हालिया संपन्न सत्र में सबसे ज्यादा बहस हुई। मोदी सरकार के 2014 में सत्ता में आने के बाद से यह लंबित था और इसे पारित करने के लिए कई बार प्रयास किए गए।

इस फैसले का कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, पीडीपी और वाइको के एमडीएमके ने विरोध किया था। संसद में ‘वी वांट जस्टिस’ (हम न्याय चाहते हैं) और ‘डोंट डिवाइड कश्मीर’ (कश्मीर मत बांटो) जैसे नारे लगाए गए। लेकिन, समाजवादी पार्टी (सपा) के सदस्यों ने विपक्षी दलों का साथ नहीं दिया। 

सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019 के दौरान भी यही हुआ, जब वाईएसआर कांग्रेस पार्टी, टीआरएस और बीजद मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित विधेयक के समर्थन में खड़े हो गए।

राज्यसभा ने कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (राजद), तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के वॉकआउट के बीच सूचना के अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। 

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