चंद्रयान-2 /तीन वैज्ञानिकों की कहानी; 7 दिन अनशन किया, तब इसरो प्रमुख सिवन के पिता ने इंजीनियरिंग कराई

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बेंगलुरु. चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर का पता चल गया है। कहा जा रहा है कि ऑर्बिटर ने कुछ तस्वीरें भी भेजी हैं। इसरो के वैज्ञानिक उससे संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से वैसे तो कई वैज्ञानिक जुड़े हैं, लेकिन सबसे अहम भूमिका इसरो प्रमुख के सिवन और मिशन डायरेक्टर ऋतु कारिधाल और प्रोजेक्ट डिप्टी डायरेक्टर, रेडियो फ्रीक्वेंसी चंद्रकांत ने निभाई। दैनिक भास्कर बता रहा है इनके जीवन की संघर्ष की कहानी कि कैसे वे गरीबी से निकलकर इस मुकाम तक पहुंचे…

पिता के साथ खेत में काम करते थे

तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के नागरकोईल कस्बे में जन्मे के. सिवन की पढ़ाई तमिल मीडियम सरकारी स्कूल में हुई। स्कूल में छुट्‌टी के दिन पिता के साथ खेत में काम करते थे। नंगे पैर स्कूल जाते थे और लूंगी पहनते थे। 12वीं में गणित में 100% अंक लिए। इंजीनियरिंग करना चाहते थे, लेकिन पिता ने कहा कि पास के कॉलेज से बीएससी कर लो, ताकि खेत में भी काम कर सको। सिवन अड़ गए और पसंद के कॉलेज  में जाने के लिए पिता के खिलाफ ही 7 दिन के अनशन पर बैठ गए। पिता नहीं माने तो बीएससी में प्रवेश ले लिया। तभी पिता को सिवन की प्रतिभा का अहसास हुआ और इंजीनियरिंग करने के लिए चेन्नई भेज दिया। उन्हें खेत बेचने पड़े। सिवन ने मद्रास इंस्टी‌ट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से बीई किया। सिवन की रुचि सैटेलाइट बनाने में थी, लेकिन काम मिला रॉकेट बनाने का। वे कहते हैं, ‘मैंने जो चाहा, वो कभी नहीं मिला, पर जो मिला, पूरी शिद्दत से किया।’

रातभर ऑफिस का काम, ताकि बच्चों को समय मिले

चंद्रयान-2 की मिशन डायरेक्टर ऋतु कारिधाल लखनऊ के निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से आई हैं। स्कूल में फिजिक्स टीचर से इतनी प्रभावित हुईं कि फिजिक्स में ग्रेजुएशन किया। फिर एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की। ऋतु मंगल ऑर्बिटर मिशन में डिप्टी डायरेक्टर रह चुकी हैं। उन्होंने ऑटोनॉमी सॉफ्टवेयर तैयार किया। इसरो में उनकी मुख्य भूमिका मिशन डिजाइन करने की है। ऋतु ने ही तय किया कि चंद्रयान-2 के लक्ष्य क्या होंगे, कैसे हासिल हाेंगे? वे बताती हैं ‘2012 में बेटा 9 और बेटी 4 साल की थी। तब घर पर होना जरूरी होता था। इसलिए काम का शेड्यूल बदला। रात भर ऑफिस का काम करतीं और दिन में बच्चों को समय देती। इसी दौरान ही मंगल व चंद्रयान लॉन्च किए। कई बार इतना वक्त भी नहीं होता कि बीमार बच्चों को अस्पताल ले जा सकूं। ऋतु कहती हैं- ‘बच्चों की स्कूल पीटीएम में इक्का-दुक्का बार ही जा पाईं। आत्मग्लानि होती कि बच्चों का वक्त नहीं दे पाई। इसलिए रात को काम किया।’

टीचर ने सूर्यकांत को चंद्रकांत बनाया, अब चंद्रयान पहचान

प. बंगाल के हुबली जिले में शिवपुर के किसान परिवार में जन्म हुआ। पिता मधुसूदन और मां असीमा ने नाम सूर्यकांत रखा, लेकिन जब स्कूल में भर्ती कराने गए तो शिक्षक ने कहा- चंद्रकांत नाम अच्छा रहेगा। नाम बदलना सार्थक रहा और आज वही चंद्रकांत चंद्रयान अभियान का अहम हिस्सा हैं। परिवार तंगहाल था। झोपड़ी में पले-बढ़े चंद्रकांत रोज 10 किमी साइकिल से स्कूल जाते थे। चंद्रकांत पिछले दो दशकों से इसरो में सैटेलाइट कम्यूनिकेशन में अहम जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ग्राउंड स्टेशन से सैटेलाइट से वार्तालाप रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नल के जरिए होता है। चंद्रकात के पास यही जिम्मेदारी है। चंद्रयान-2 और उससे संपर्क साधने वाले ग्राउंड स्टेशन का एंटीना सिस्टम चंद्रकांत ने ही डिजाइन किया है। चंद्रकांत ने चंद्रयान-2 का सिग्नल सिस्टम बनाया है। इसके जरिए 3 लाख 84 हजार किमी दूर ऑर्बिटर से धरती पर इसरो को सिग्नल मिलता है।

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