एसआईटी ने 1984 के दंगे के गवाहों का बयान अब तक दर्ज नहीं किया

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कानपुर, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में कानपुर में हुए सिख विरोधी दंगों के मामलों की जांच फिर से करने के लिए फरवरी 2019 में गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अभी तक एक भी गवाह का बयान दर्ज नहीं किया है। ऑल इंडिया रियट विक्टिम रिलीफ कमिटी (एआईआरवीआरसी) का एक प्रतिनिधिमंडल, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के दो वकील गुरबख्श सिंह देव और प्रसून कुमार शामिल हैं, ने गुरुवार को एसआईटी के (सेवानिवृत्त अतिरिक्त निदेशक, अभियोजन) सदस्य योगेश्वर कृष्ण श्रीवास्तव से बातचीत की। उन्होंने सभी आरोपों का खंडन किया। इसके अलावा उन्होंने मामले से जुड़ी फाइलों के गायब होने की खबरों का भी खंडन किया।

उन्होंने कहा, “कोई फाइल गायब नहीं हुई है। सिर्फ हम अधिकतर एफआईआर या न्यायिक आदेशों या 1984 के मामलों से संबंधित कागजात का पता लगाने में असमर्थ हैं।”

लापता फाइलों की रिपोर्ट कानपुर दंगा पीड़ितों के परिवारों के लिए निराशाजनक साबित हुई है, जिनमें से कई भारत में अन्य स्थानों पर स्थानांतरित हो गए हैं तो कुछ विदेश चले गए हैं।

एआईआरवीआरसी के अध्यक्ष कुलदीप सिंह भोगल ने कहा, “वे अभी भी 35 साल बाद न्याय पाने की उम्मीद में जी रहे हैं।”

अधूरे मन से काम कर रहे एसआईटी के काम करने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विशाखा सिंह के बेटे, 63 वर्षीय अवतार सिंह एआईआरवीआरसी के प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे और एसआईटी को इस बात की भनक नहीं थी।

उन्होंने 1984 के दंगे में अपने चार सगे भाई, एक बहन और अभिभावक सहित परिवार के सात सदस्यों को खो दिया था। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एसआईटी को उनके मामले की जानकारी तक नहीं है और न ही उनकी प्राथमिकी की उनके पास कोई कॉपी है।

जब प्रतिनिधिमंडल ने एसआईटी को उनकी उपस्थिति में अवतार सिंह के बयान को दर्ज करके एक प्रतीकात्मक शुरुआत करने के लिए कहा, तो एसआईटी सदस्य ने वकीलों से सिंह को एक हलफनामा जमा करने के लिए कहा। एसआईटी ने 35 साल पुरानी एफआईआर की एक कॉपी देने की जिम्मेदारी अवतार सिंह पर छोड़ दिया।

बाद में पत्रकारों से बात करते हुए, भोगल ने कहा कि वे एसआईटी के काम करने के तरीके से बहुत निराश थे।

बाद में संवाददाताओं से बात करते हुए भोगल ने कहा कि जिस तरह एसआईटी काम कर रही है उससे वे बहुत निराश हैं।

उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी गवाहों को सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की है, जो पूरी नहीं हुई है।

अगले हफ्ते, एआईआरवीआरसी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर करने की योजना बनाई है, जिसमें वह कानपुर एसआईटी के कई बिंदुओं को सूचीबद्ध करने वाले हैं, जिसमें एसआईटी विफल रही है।

सन् 1984 के दंगों का सबसे अधिक प्रभाव दिल्ली के बाद कानपुर में देखा गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा नियुक्त न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा आयोग ने शहर में 127 लोगों की मौत दर्ज की थी। लेकिन इस मामले में अब तक एक भी व्यक्ति को सजा नहीं मिली है।

अगस्त, 2017 में एआईआरवीआरसी द्वारा दायर की गई याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को मामले की जांच करने के लिए एसआईटी का गठन करने का निर्देश दिया था। काफी विलंब के बाद फरवरी 2019 में एसआईटी गठित की गई। हालांकि उनका काम मई में हुए 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद शुरू हुआ।

चार सदस्यीय एसआईटी का नेतृत्व सेवानिवृत्त यूपी डीजीपी अतुल कर रहे हैं। अन्य सदस्य, सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश सुभाष चंद्र अग्रवाल और सेवानिवृत्त अतिरिक्त निदेशक (अभियोजन) योगेश्वर कृष्ण श्रीवास्तव हैं। एसपी बालेंदु भूषण सिंह इसके सदस्य-सचिव हैं।

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