बिहार में सीटों के बंटवारे पर नीतीश ने दिया ये फॉर्मूला, क्या बीजेपी मानेगी?

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पटना: बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच विधान सभा चुनाव में सीटों के ताल मेल पर नीतीश का फॉर्मूला तैयार है. जेडीयू के सूत्रों ने एबीपी न्यूज़ को बताया कि लोक सभा में भले ही बराबर-बराबर सीटों पर सहमति बन गई हो पर विधान सभा में 2010 में लड़े गए सीटों का आधार होगा. 2010 में जेडीयू 141 और बीजेपी 102 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. अब साथ में लोक जन शक्ति पार्टी है इसलिए उसके लिए भी सीटें छोड़नी है. लिहाज़ा नीतीश का फॉर्मूला ऐसी स्थिति के लिए भी तैयार है.

जेडीयू और बीजेपी दोनों अपने कोटे से बराबर-बराबर सीटें एलजेपी के लिए छोड़ने की बात कह रही है. यानि अगर एलजेपी को 30 सीट भी देनी हो तो 15 सीट जेडीयू और 15 सीट बीजेपी अपने कोटे से दे. नीतीश के इस फॉर्मूले का आधार साफ है. नीतीश की पार्टी के नेताओं का कहना है कि लोकसभा में 2009 के फॉर्मूले को आधार बनाया गया. 2009 के लोक सभा में जेडीयू 25 सीटों पर चुनाव लड़ी थी तो बीजेपी 15 पर.

ऐसे में रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी को भी एडजस्ट करना था तो नीतीश और बीजेपी में एलजेपी को 6 सीट देने के बाद बराबर यानि 17-17 सीटों पर सहमति बनी. इसी तरह से जेडीयू ने 2009 के चुनाव को आधार बनाते हुए अपना दावा कर दिया है. हालांकि जेडीयू नेता श्याम रजक ने कहा है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और पीएम नरेंद्र मोदी और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ही तय करेंगे. पर बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा ये तय है. इसके पहले बीजेपी नेता और राज्य सभा सांसद डॉ सी पी ठाकुर ने कहा था कि बिहार में विधानसभा जेडीयू और बीजेपी दोनों ही बराबर बराबर सीटों में चुनाव लड़ेगी.

नीतीश की पार्टी का तर्क है कि बीजेपी केंद्र में बड़ा भाई ज़रूर है पर बिहार में नीतीश ही बड़े भाई की भूमिका में है. इस हिसाब से ज़्यादा सीटें चाहिए. केंद्रीय मंत्रिमंडल में बीजेपी ने जेडीयू को मात्र एक मंत्री पद देने की पेशकश की जिसे नीतीश कुमार ने ठुकरा दिया. नरेंद्र मोदी वहां पीएम थे इसलिए उनका विशेषाधिकार था पर कोटा बीजेपी को तय करना चाहिए कि कितने मंत्री जेडीयू से होना चाहिए. क्योंकि बिहार में नीतीश मंत्रिमंडल में शामिल बीजेपी कोटे के मंत्रियों का अनुपात जीती हुई सीटों के आधार पर है.

महागठबन्धन में नीतीश और लालू साथ लड़े थे और बराबर सीटों का पैमाना बनाया गया था. कांग्रेस पार्टी को चालीस सीटें दी गई थी. उस वक्त बीजेपी को हराने के लिए नीतीश ने कई सीटों की कुर्बानी दी थी. आज बीजेपी को भी पता है कि बगैर नीतीश के एनडीए को कितना नुकसान हो सकता है. ऐसे में नीतीश के दबाव का असर भी पड़ेगा.

नीतीश और लालू बराबर सीटों पर लड़े थे पर लालू को ज़्यादा सीटें मिली थी जिसका नतीजा ये हुआ था कि नीतीश हमेशा दबाव में रहते थे और सरकार पर असर हुआ था. महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजे ने बीजेपी के मोल भाव को कम कर दिया है.

नीतीश के पास बीजेपी के अलावा भी ऑप्शन है. कांग्रेसी नेता और आरजेडी नेता नीतीश को बार बार अपने खेमे में लाने की कोशिश कर रहे हैं. कल यानि मंगलवार को बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जे पी नड्डा आ रहे हैं. वो क्या कहेंगे इसपर सबकी निगाह है. लिहाजा बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष ने सीटों के तालमेल पर चुप्पी साध ली है. आज सवाल करने पर प्रदेश अध्यक्ष संजय जयसवाल सवाल से कन्नी काटने लगे.

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