BALA Movie Review: गंजेपन ने ‘बाला’ की जिंदगी में मचाया कोहराम, मजेदार है आयुष्मान की ये फिल्म

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Movie Review Bala : ‘हेयर लॉस नहीं आइडेंटीटी लॉस हो रहा है हमारा…’ फिल्म ‘बाला’ का ये डायलॉग इसकी पूरी कहानी बयां कर रहा है. हमारे समाज में बाहरी खूबसूरती इस हद तक लोगों पर हावी है कि उसके बिना वो अपने जीवन की कल्पना ही नहीं करना चाहते. सिर्फ आम लोगों में ही नहीं बल्कि बड़े पर्दे पर भी इसका गहरा प्रभाव दिखता है. इंडस्ट्री में मौजूद इस भेदभाव का सबसे अहम उदाहरण अनुपम खेर हैं. अनुपम खेर को उनके गंजेपन के चलते सिर्फ 26 साल की उम्र में ही 50 साल के बूढ़े का किरदार फिल्म ‘सारांश’ में करना पड़ा था.

बाला में आयुष्मान खुराना भी समाज के खूबसूरती के पैमाने पर खरे नहीं उतरते क्योंकि 25 साल की उम्र में ही वो गंजेपन का शिकार हो जाते हैं. उन्हें अपने इस गंजेपन के चलते समाज में कई बार मजाक का पात्र बनना पड़ता है. ऐसे में वो धीरे-धीरे अपना कॉन्फिडेंस खोने लग जाते हैं. लेकिन क्या बाहरी खूबसूरती ही व्यक्ति की असली पहचान है? क्या जो खूबसूरत है वो सफलता पाने का हकदार नहीं है? बाला यही सवाल उठाती है.

कहानी

‘बालमुकुंद शुक्ला’ उर्फ ‘बाला’ (आयुष्मान खुराना), इनका ये नाम पड़ा था इनके घने खूबसूरत बालों की वजह से..लेकिन जवानी आते-आते इनके घने बालों में शुरू हो गया पतझड़ का मौसम. बाला की बचपन की दोस्त हैं लतिका त्रिवेदी (भूमि पेडनेकर) का रंग सांवला है और बाला इसी के चलते हमेशा उनका मजाक उड़ाते हैं. लेकिन जवान होते-होते कहानी थोड़ी बदल जाती है. बड़े होते-होते जहां बाला के बाल झड़ जाते हैं और वो अपने करियर में कोई खास कमाल नहीं कर पाते.

बाला हमेशा बस अपने आपको लेकर शर्मिंदा रहते हैं और गंजेपन के दाग को खुद से दूर कर लेना चाहते हैं. वहीं, दूसरी तरफ लतिका त्रिवेदी अपने रंग को स्वीकार कर लेती हैं और एक सफल वकील बन जाती हैं. दोनों भले ही स्कूल के साथी हों लेकिन इनका हमेशा 36 का आंकड़ा रहता है.

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