अयोध्या पर सुप्रीम फैसला: आसान शब्दों में समझें शुरू से आखिर तक कोर्ट रूम के अंदर की पूरी कार्यवाही

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने देश के सबसे विवादित रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद मुद्दे पर पूरी विवादित जमीन रामलला को देने का फैसला किया. इसके साथ ही अदालत ने मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े की अपील खारिज कर दी.

जानिए- सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ने फैसला पढ़ते हुए क्या कहा?

– सुप्रीम कोर्ट ने कल शाम को बता दिया था कि अयोध्या केस का फैसला सुबह 10.30 बजे पढ़ा जाएगा. इस वजह से सुबह से ही सुप्रीम कोर्ट परिसर के पास गहमागहमी शुरू हो गई. मीडिया के कारिंदे सुप्रीम कोर्ट, जजों की रिहाइश और अयोध्या में डेरा डाले हुए थे और पल-पल की खबर बता रहे थे.

– जैसे ही 10.30 बजा, सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की पीठ बैठी और मुख्य न्यायधीश ने बोलना शुरू किया. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सबसे शांति की अपील की और फैसले को पढ़ना शुरू किया.

-सबसे पहले अदालत ने इस विवाद का निपटारा किया कि मस्जिद पर मालिका हक किसका होगा. शिया या सुन्नी वक्फ बोर्ड का? सुप्रीम कोर्ट ने शिया वक्फ बोर्ड की अर्जी खारिज कर दी और 1946 का फैसला बरकरार रखा.

इसके बाद इस केस के मुख्य विवाद पर जजों ने अपना फैसला पढ़ना शुरू किया. सभी जजों ने पहले फैसले की कॉपी पर साइन किए, जिससे ये साफ हो गया कि ये फैसला एकमत में होने जा रहा है. जैसे ही चीफ जस्टिस ने फैसला पढ़ना शुरू किया, ये संकेत दे दिया कि इसे पढ़ने में करीब आधा घंटा लगेगा.

– सीजेआई ने फैसला पढ़ते हुए कहा, ”कोर्ट को देखना है कि एक व्यक्ति की आस्था दूसरे का अधिकार न छीने. मस्ज़िद 1528 की बनी बताई जाती है लेकिन कब बनी इससे फर्क नहीं पड़ता. 22-23 दिसंबर को मूर्ति रखी गयी, जगह नजूल की ज़मीन है. लेकिन राज्य सरकार हाई कोर्ट में कह चुकी है कि वह ज़मीन पर दावा नहीं करना चाहती.”

कोर्ट ने कहा, ”कोर्ट हदीस की व्याख्या नहीं कर सकता. नमाज पढ़ने की जगह को मस्ज़िद मानने के हक को हम मना नहीं कर सकते. 1991 का प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट धर्मस्थानों को बचाने की बात कहता है. यह एक्ट भारत की धर्मनिरपेक्षता की मिसाल है.” सीजेआई ने कहा, ”विशारद ने अपने साथ दूसरे हिंदुओं के भी हक़ का हवाला दिया. निर्मोही सेवा का हक मांग रहा है, कब्ज़ा नहीं.”

सीजेआई ने फैसले में बड़ी बात कही, ”निर्मोही का दावा 6 साल की समय सीमा के बाद दाखिल हुआ. इसलिए खारिज है.” सीजेआई ने कहा, ”सूट 5 (रामलला) हद के अंदर माना जाएगा.” कोर्ट ने कहा, ”निर्मोही अपना दावा साबित नहीं कर पाया है. निर्मोही सेवादार नहीं है. रामलला न्याय से सम्बंधित व्यक्ति हैं, राम जन्मस्थान को यह दर्जा नहीं दे सकते.”

– इसके बाद कोर्ट ने कहा, ”पुरातात्विक सबूतों की अनदेखी नहीं कर सकते. हाई कोर्ट के आदेश पर पूरी पारदर्शिता से हुआ. उसे खारिज करने की मांग गलत है. सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बहस में अपने दावे को बदला. पहले कुछ कहा, बाद मे नीचे मिली रचना को ईदगाह कहा. साफ है कि बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बना था.”

– कोर्ट ने कहा, ”नीचे विशाल रचना थी, वह रचना इस्लामिक नहीं थी. वहां मिली कलाकृतियां भी इस्लामिक नहीं थी. ASI ने वहां 12वी सदी की मंदिर बताई. विवादित ढांचे में पुरानी संरचना की चीज़ें इस्तेमाल हुईं. कसौटी का पत्थर, खंभा आदि देखा गया. ASI यह नहीं बता पाया कि मंदिर तोड़कर विवादित ढांचा बना था या नहीं. 12वी सदी से 16वी सदी पर वहां क्या हो रहा था. साबित नहीं.”

कोर्ट ने कहा, ”हिन्दू अयोध्या को राम भगवान का जन्मस्थान मानते हैं. मुख्य गुंबद को ही जन्म की सही जगह मानते हैं. अयोध्या में राम का जन्म होने के दावे का किसी ने विरोध नहीं किया. विवादित जगह पर हिन्दू पूजा करते रहे थे. गवाहों के क्रॉस एक्जामिनेशन से हिन्दू दावा झूठा साबित नहीं हुआ.”

– कोर्ट ने कहा, ”रामलला ने ऐतिहासिक ग्रंथों, यात्रियों के विवरण, गजेटियर के आधार पर दलीलें रखीं. चबूतरा, भंडार, सीता रसोई से भी दावे की पुष्टि होती है. हिन्दू परिक्रमा भी किया करते थे. लेकिन टाइटल सिर्फ आस्था से साबित नहीं होता.”

– कोर्ट ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि 6 दिसंबर 1992 को स्टेटस को का ऑर्डर होने के बावजूद ढांचा गिराया गया. लेकिन सुन्नी बोर्ड एडवर्स पोसेसन की दलील साबित करने में नाकाम रहा है. लेकिन 16 दिसंबर 1949 तक नमाज हुई. कोर्ट ने कहा कि सूट 4 और 5 में हमें सन्तुलन बनाना होगा, हाई कोर्ट ने 3 हिस्से किये, यह तार्किक नहीं था.

– कोर्ट ने कहा, ”हर मजहब के लोगों को एक जैसा सम्मान संविधान में दिया गया है. बाहर हिंदुओं की पूजा सदियों तक चलती रही. मुसलमान अंदर के हिस्से में 1856 से पहले का कब्जा साबित नहीं कर पाए.”

कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए बड़ी बात कही कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी वैकल्पिक ज़मीन देना ज़रूरी है. इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार तीन महीने में ट्र्स्ट बना कर फैसला करे. ट्रस्ट के मैनेजमेंट के नियम बनाए, मन्दिर निर्माण के नियम बनाए. विवादित जमीन के अंदर और बाहर का हिस्सा ट्रस्ट को दिया जाए.” कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ की वैकल्पिक ज़मीन मिले. या तो केंद्र 1993 में अधिगृहित जमीन से दे या राज्य सरकार अयोध्या में ही कहीं दे.



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