ये पहला परिवार नहीं, जो गद्दी के लिए बिखरा, सत्ता के खेल में परिवारों का टूटना पुराना शग़ल है

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नई दिल्ली: महाराष्ट्र में चुनावी नतीजे आने के बाद से चल रहे सियासी घटनाक्रम के बीच बीजेपी ने अजित पवार के समर्थन से सरकार बना ली है. देवेंद्र फडणवीस नई सरकार में सीएम बने हैं, जबकि एनसीपी नेता अजीत पवार ने डिप्टी सीएम की शपथ ली है. एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने साफ किया है कि वह अजीत पवार के साथ नहीं हैं. अजीत पवार के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि पवार परिवार टूट चुका है. शरद पवार की बेटी और सांसद सुप्रिया सुले ने भी परिवार और पार्टी टूटने की बात कही है. हालांकि भारत की राजनीति में यह पहला मौका नहीं है जब सत्ता की वजह से कोई परिवार टूटा है. देवीलाल परिवार से लेकर करुणानिधी के परिवार तक तमाम ऐसे उदाहरण हैं जब सत्ता के लिए राजनीतिक परिवारों ने अपने रास्ते अलग किए हैं.

देवीलाल परिवार टूटा

1989 में हरियाणा के दिग्गज नेता देवीलाल ने वीपी सिंह की सरकार में उप प्रधानमंत्री की शपथ ली. उप प्रधानमंत्री बनने से पहले देवीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री थे. देवीलाल के डिप्टी पीएम बनते हुए उनका परिवार टूट गया. देवीलाल ने डिप्टी पीएम बनने के बाद राज्य की कमान ओम प्रकाश चौटाला के हाथ में दे दी. देवीलाल के दूसरे बेटे रणजीत चौटाला भी सीएम की रेस में शामिल थे और जब 1987 में देवीलाल सीएम बने थे तो रणजीत चौटाला को सरकार में कृषि मंत्री का पद मिला.

ओम प्रकाश चौटाला के सीएम बनने से नाराज होकर रणजीत चौटाला ने देवीलाल की पार्टी छोड़ दी और कांग्रेस में शामिल हो गए. रणजीत चौटाला 2019 के विधानसभा चुनाव 32 साल बाद विधायक चुने गए हैं. रणजीत चौटाला फिलहाल खट्टर सरकार में कैबिनेट मंत्री है. वहीं ओमप्रकाश चौटाला 5 बार हरियाणा का सीएम बनने के बाद जेबीटी घोटाले में 10 साल की सजा काट रहे हैं.

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चौटाला परिवार में टूट की कहानी इतनी ही नहीं है. पिछले साल ओमप्रकाश चौटाला के दोनों बेटे अभय और अजय भी अलग हो गए. अजय चौटाला ने बेटे दुष्यंत चौटाला के साथ मिलकर जननायक जनता पार्टी बनाई है, जबकि अभय चौटाला के पास इंडियन नेशनल लोकदल की कमान है. अजय चौटाला के बेटे दुष्यंत चौटाला की मदद से हरियाणा में बीजेपी की सरकार बनी है. दुष्यंत चौटाला को 2019 हरियाणा विधानसभा चुनाव के बाद खट्टर सरकार में डिप्टी सीएम बनाया गया.

राज ठाकरे ने चुना अलग रास्ता

अजीत पवार के कदम से शिवसेना सत्ता से महरूम रह गई. लेकिन शिवसेना में बाल ठाकरे का परिवार करीब 15 साल पहले ही टूट चुका है. बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे हमेशा अपने चाचा के कदमों पर चला करते थे. माना जाता था कि बाल ठाकरे राज को ही पार्टी की कमान देंगे. लेकिन 2004 में बाल ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया. इसके बाद राज ठाकरे ने 2005 में खुद को शिवसेना से अलग कर लिया. 2006 में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नव निर्माण सेना बनाई. 2009 में राज ठाकरे की पार्टी ने पहली बार चुनाव लड़ा और उसके 14 विधायक जीते.

हालांकि राज ठाकरे राजनीति में ज्यादा कामयाब नहीं हो पाए हैं. राज ठाकरे की पार्टी का 2014 और 2019 में सिर्फ 1-1 विधायक ही चुनाव जीत पाया है. वहीं शिवेसना 2014 में 63 विधायकों और 2019 में 56 विधायकों के साथ राज्य की दूसरे सबसे बड़ी पार्टी बनी.

चंद्रबाबू नायडू परिवार तोड़कर बने सीएम

1982 में अभिनेता से नेता बने एनटी रामा राव आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. 1985 में व दोबारा से सीएम बने. 1989 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और 1994 में उनकी सत्ता में वापसी हुई. एनटी राव की बेटी की शादी नायडू के साथ हुई थी. 1994 में नायडू ने एनटी राव को पार्टी अध्यक्ष के पद से हटा दिया और 1995 में पहली बार सीएम पद की शपथ ली.

एनटी राव की पत्नी लक्ष्मी ने इस बात से नाराज होकर अलग पार्टी बनाई थी. हालांकि उसे कोई कामयाबी नहीं मिली. 2014 में लक्ष्मी जगमोहन रेड्डी की वीआरएससी में शामिल हो गई.

बादल परिवार

2010 में पंजाब में बादल परिवार में टूट देखने को मिली थी. 2010 में प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत बादल ने शिरोमणि अकाली दल से अलग होकर पीपीपी बनाई थी. मनप्रीत बादल की प्रकाश सिंह बादल से नाराजगी 2007 में शुरू हुई. 2007 में अकाली दल की सरकार बनने के बाद प्रकाश सिंह बादल ने अपने बेटे सुखबीर बादल को डिप्टी सीएम बनाया, जबकि मनप्रीत बादल को वित्त मंत्रालय दिया गया. लेकिन मनप्रीत बादल प्रकाश सिंह बादल द्वारा सुखबीर को अपना वारिस घोषित करने से नाराज हुए.

मनप्रीत बादल की पार्टी पीपीपी 2012 के चुनाव में कोई कमाल नहीं दिखा पाई. लेकिन 2014 में मनप्रीत बादल कांग्रेस में शामिल हो गए. 2017 में मनप्रीत बादल अमरिंदर सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने में कामयाब रहे. वहीं शिरोमणि अकाली दल की कमान अब पूरी तरह से सुखबीर बादल के हाथ में है.

करुणानिधी के बेटे अलग हुए

1969 से 2011 के बीच एम करुणानिधी पांच बार तमिलनाडु के सीएम बने. तमिलनाडु की राजनीतिक विरासत एक तरह से एमके स्टालिन के हाथ में ही थी, लेकिन स्टालिन के हाथ में कमान आना उनके भाई अलागिरी को मंजूर नहीं था. अलागिरी की बगावत को देखते हुए करुणानिधी ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था और पार्टी की कमान पूरी तरह से स्टालिन के हाथ में आ गई.

अलागिरी ने फूट डालने की वजह कहीं ना कहीं कनिमोझी भी रही. केंद्र की यूपीए 2 में कनिमोझी एक तरह से डीएमके की अगुवाई कर रही थीं, जबकि राज्य में करुणानिधी के बाद ज्यादातर फैसले स्टालिन ही लेते थे. इसलिए अलागिरी राज्य और केंद्र सरकार में भागीदारी में खुद को अनदेखा महसूस कर रहे थे.

मुलायम का परिवार भी टूटा

2016 में तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यंत्री रहे मुलायम सिंह यादव के परिवार में भी टूट देखने को मिली थी. 2016 के अंत में मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव के कुछ फैसलों पर नाराज होते हुए अपने भाई शिवपाल यादव को समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष बना दिया. अखिलेश को पिता का यह फैसला मंजूर नहीं था. अखिलेश चूंकि उस समय यूपी के मुख्यमंत्री थे इसलिए पार्टी के ज्यादातर विधायकों का समर्थन उन्हें हासिल था. अखिलेश यादव पार्टी मीटिंग बुलाकर 2016 में ही पार्टी के नए अध्यक्ष बन गए.

मुलायम परिवार की लड़ाई चुनाव आयोग में भी पहुंची. चुनाव आयोग में बाजी अखिलेश के हाथ लगी और समाजवादी पार्टी का चिन्ह उन्हें मिल गया. वहीं शिवपाल यादव ने 2019 में अलग पार्टी बनाकर लोकसभा चुनाव लड़ा. लेकिन उनकी पार्टी 1 फीसदी वोट भी हासिल नहीं कर पाई. हालांकि मुलायम सिंह यादव एसपी के टिकट पर ही 2019 में सांसद बने.

इनके अलावा गांधी परिवार से अलग होकर संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी और वरुण गांधी आज बीजेपी के सांसद हैं. सिंधिया परिवार का हाल भी ऐसा ही है जहां माधवराव सिंधिया की बहन बीजेपी में है वहीं उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस पार्टी में हैं.

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